Yaado ki Sahelgaah - 31 in Hindi Biography by Ramesh Desai books and stories PDF | यादो की सहेलगाह - रंजन कुमार देसाई (31)

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यादो की सहेलगाह - रंजन कुमार देसाई (31)


                   : : प्रकरण : : 31

        मेरी बड़ी बेटी क्षमता ने बी कोम का अभ्यास पूरा कर लिया था. उस दौरान उस को एक मुस्लिम युवक के साथ प्यार हो गया था.

        मैंने खुद प्रेम विवाह किया था. इस लिये मुझे उस से शादी करने में कोई समस्या नहीं था. लड़का ज्यादा पढ़ा लिखा नहीं था. उस की मटन की शोप थी.

         क्षमता ने उस के साथ एक बात का खुलासा कर लिया था.

          " आप नोन वेज खा सकते हैं. मैं आप को कभी मना नहीं करूंगी.. लेकिन मैं कभी नोन वेज नहीं खाउंगी. आप मुझ पर दबाव नहीं लाना.. "

          उस ने क्षमता की शर्त को स्वीकार लिया था. उस के मा बाप को भी यह रिश्ता पसंद था  लेकिन उस ने शादी के पहले अपने तरीके से रहने की जिद पकड़ी तो उस के मा बाप ने इस शादी पर दिक्क़ते ख़डी करनी शुरू की. लड़का उसे शादी करने को तैयार था. उस स्थिति में मा बाप ने घर और संपत्ति से बेदखल कर दिया था.

        दोनों शादी करने वाले थे. उस दौरान एक मराठी जोड़ा हमारी बाजु में रहने आया था. लड़के का नाम पराग था और उस की बीवी का नाम प्रनौती था.

        क्षमता और प्रनौती की उम्र में 4:से 5 साल का फर्क था. दोनों में अच्छी बनती थी. इसी तरह हम पति पत्नी को भी प्रनौती और पराग से जम गया था.

       हम दोनों परिवार बहुत जल्द करीब आ गये थे मुझे प्रनौती से लगाव हो गया था. उसी तरह पराग को भी क्षमता से लगाव हो गया था.

        हम दोनों परिवार के बीच का रिश्ता बिल्डिंग में भी चर्चा का विषय बन गया था. लोगो को वह पसंद नहीं आया था. बिल्डिंग के खास व्यकित ने मुझे पराग के बारे में चेतावनी दी थी, लेकिन उस वकत प्रनौती के साथ बहुत ही इनवॉल्व हो गया था. मेरा यह रिश्ता खो जाने के भय से मैंने सुनी हुई बात में विश्वास नहीं किया था.

        वह लोग हमें अंकल आंटी कहते थे. हम भी उन्हें उसी रिश्ते से बुलाने लगे. हम उन्हें अंकल आंटी कहते थे इतना ही नहीं  प्रनौती की मा भी हमें उसी नाम से बुलाते थे.

        उन्ही दिनों सोसायटी समिति के काम को लेकर सवाल खड़ा हुआ था. वह लोग कुछ काम करते नहीं थे और सोसायटी के पैसे से मजा करते थे, दारू की महफ़िल जमाते थे. कोई हिसाब रख़ते नहीं थे.

      उस के सामने पराग ने आवाज उठाया था. उस को काम करने में कोई दिलचस्पी थी. लेकिन खाने को मिलता था. उस बात की लालच थी.

       जूनी समिति बर्खास्त हो गई थी. और नई कमिटी का चुनाव हुआ था.

       जिस में पराग को सेक्रेटरी चुना गया था. एक अन्य महाराष्ट्रीय व्यकित को चेयरमैन बनाया गया था और मुझे खजानची बनाया गया था.

       कारोबार हाथ बदलने से ठीक हो गया था.

       मैं  खजानची होने के नाते एक एक पैसे का हिसाब रखता था . कैश भुगतान हो या चेकस. मैं उस को रोजिन्दा बैंक मैं जमा करवाता था. ज्यादा नकद पैसे हाथ में नहीं रखता था.

       मेरी इस तरीके से पराग के पासे उलट पड़ गये थे. वह मानता पैसों का कारोबार मैं संभालता था तो वह ज़ब चाहे तब सोसायटी के पैसे को अपने लिये इस्तेमाल कर सकता था.

       एक साल में बैंक में काफ़ी पैसे जमा हो गये थे. क़ानून के तौर पर मैंने उस की एफ डी भी बना ली थी.

       चेयरमैन का तो उस में कोई योगदान नहीं था, वह तो दो महिने में ही इस्तीफा देकर समिति से बाहर हो गया था. पराग को भी कोई चीज में दिलचस्पी नहीं थी. इस स्थिति में सोसाइटी की पूर्ण जिम्मेदारी मेरी सिर आ गई थी.

       बिल्डिंग में एक मारवाड़ी था जो भाडुत था. रूम किसी ओर की थी और वह बोलता था. उस को यह रूम उस को तोहफ़े के रूम में दी है. ऐसा बहाना बनाकर मेंटेनेंस नहीं भरता था. सच्चाई सामने आ गई थी. तब भी वह एक ही बात का रटण कर के पैसे नहीं देता था.

      इस स्थिति में मैंने उस से कड़क हाथों से काम लिया था.

       उस के घर में पूजा थी. और ट्रक भर के सामान कंपाउंड में आ रहा था. मैंने उसे अंदर आते हुए रोकते हुए पैसे की डिमांड की थी. घर में मेहमान उपस्थित थे,  उस की इज्जत दाव पर लग गई थी और उस ने दो मिनिट में भुगतान कर दिया था.

      उसी तरह कोई डेढ़ श्याने के भड़काने से लोगो ने जेहाद पोकारते हुए मेन्टेनन्स देने से इन्कार किया था. तो तुरंत मैंने डिफाल्टर की सूचि नोटिस बोर्ड पर चिपका दी थी.

       जिन लोगो के पैसे बाकी थे. उन का पानी बंद कर दिया था. सोसायटी में नगर पालिका का पानी बराबर नहीं आता था उस लिए हमें टैंकर्स मांगवानी पड़ती थी और अतिरिक्त पैसे भरने पड़ते थे.

       नोटिस देखते ही सब लोगो ने फटाफट पैसे भर दिये थे.

        मैंने उन का नाक दबाया था और उन का मूंह खुलवाया था.

        सोसायटी से कुछ ना मिला तो पराग क्षमता के पीछे लग गया. 

        एक बार उस ने मेरी मौजूदगी में क्षमता को गलत जगह छुआ था उस की बूरी नियत का प्रमाण पत्र था. मैंने उसे टोका था. उस ने तो मेरी माफ़ी मांगी थी. लेकिन प्रनौती को उस के पति पर भरोसा था. मैंने उसे जो कहां था.. उस से उसे बुरा लग गया था. 

         और उस संबंध का अंत हो गया. 

          बाद में असलियत बाहर आई थी. खुद क्षमता ने मुझे बताया था.

          पराग ने मौके का फायदा उठकर उस का यौन शोषण किया था. उतना ही नहीं उसे सिफिलिस रोग का उपहार दिया था.

          उस प्रेमी हकीकत से अवगत हुआ था. उसे बहुत गुस्सा आया था. उस ने पराग पर जीवलेवा हमला किया था और मौत उस के करीब आ पहुंची थी. उस के भी बचने की उम्मीद नहीं थी. उस वक़्त प्रनौती को सच्ची हकीकत मालूम पड़ी थी और वह उसे छोड़कर चली गई थी.

      क्षमता के प्रेमी को जैल हो गई थी.

      और दूसरी ओर वह बीमार हो गई थी. डोक्टर ने निदान किया था.

      क्षमता सिफिलिस की शिकार हो गई थी. उस की जिंदगी का कोई भरोसा नहीं था.

       मैं तो उस की शादी का सपना देख रहा था.

       लेकिन सब कुछ बदल गया था.

                      00000000000   ( क्रमशः)