Yaado ki Sahelgaah - 30 in Hindi Biography by Ramesh Desai books and stories PDF | यादो की सहेलगाह - रंजन कुमार देसाई (30)

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यादो की सहेलगाह - रंजन कुमार देसाई (30)

      

                 : : प्रकरण - 30 : :

      मै स्नेहा को नियमित तौर से NGO में मिलने  जाता था. उस बहाने हमारे बीच सारी बातें होती थी. मैंने कभी नहीं सोचा था. मैं कभी दोबारा गरिमा को नहीं मिल पाउँगा, लेकिन हमारे लिये ईश्वर ने कुछ अलग ही सोचा था.

       मैं एक बार गरिमा के NGO में गया था. उस वक़्त एक लड़का किसी अंधी औरत को लेकर वहाँ आया था. उसे देखकर मैं चकित सा ऱह गया था. वह मेरी पिताजी के परम मित्र की बेटी नीला थी

       उस के बारे में मैंने अपने पिताजी से बहुत कुछ सुना था.

        उस की बेटी की शादी होने वाली थी. आम तौर पर लडके बारात लेकर लड़की के घर आते हैं. लेकिन यहाँ उलटी गंगा बह रही थी. लडके वालों ने शादी के अपने घर बुलाया था. इतना नहीं दहेज और अन्य व्यवहार को लेकर बहुत तंग किया था.

        वह लोग लड़की की शादी के लिये लडके के गांव जा रहे थे. रास्ते में दुर्घटना हुई थी, जिस में लड़की और उस के पति की मौत हो गई थी, और पत्थर से सिर टकराने की वजह से उस की आंखे खो बैठी थी. उस को इस स्थिति में जेठ जेठानी के साथ रहने की बारी आई थी. वह लोगो नीला को नौकरानी की तरह रखते थे, जेठ तो हरामी था वह अपनी बीवी को घड़ी घड़ी मायके भेजकर उस का यौन शोषण करता था. 

        उस का लड़का यह बात बर्दास्त कर नहीं पा रहा था. वह उसे गरिमा के NGO में लेकर आया था.

        मैंने उसे पहचान लिया था. लेकिन कैसे बात करुं? यह कश्मकश में था.

        मैं गरिमा और स्नेहा से बात कर था.. उस ने इतने समय के बाद मेरी आवाज को पहचान लिया था.

         उस ने तुरंत सवाल किया था?

          " कौन संभव भैया? "

          मैं अपने व्यवहार के लिये शर्मिंदा हो गया था.

          मुझे उसे सामने से बुलानी चाहिये थी.

          फिर तो हम दोनों में बातचीत का सिलसिला हो गया था. अब मेरी लिये NGO में दो व्यकित थे जिसे मुझे मिलने का मन होता था.

          आज तक मैंने अपने बेटे सुंदर के बारे में गरिमा को कुछ बताया नहीं था. लेकिन मुझे चला की वह अंधे बच्चों को भी NGO में रखती थी. तो मैंने उसे वहाँ दाखिल करने का फैंसला किया था. लेकिन वह कहीं जाने को तैयार नहीं था.

        उस को शेयर बाजार का चस्का लग गया था.. वह दिन रात उसी में लगा रहता था. वह खुद तो देख नहीं सकता था लेकिन स्टॉक के भाव के बिना एक पल भी ऱह नहीं पाता था.

         मार्किट 9-15 को शुरू होती थी और वह 6-45 को ही चैनल शुरू कर देता था.. और सब कुछ देखता था, सब की बातें सुनता था. और कौन सा स्टोक लेना वह तय करता था. मैंने उसे  लाख बार समजाया था, लेकिन वह इंट्रा डे के चककर से बाहर नहीं निकलता था. वह एक नंबर का लालची था. उस वजह से मेरा ढाई लाख का नुकसान हुआ था, फिर भी उस की आंखे खुली नहीं थी. यह बडे अफ़सोस और चिंता की बात थी.

        मैंने उसे म्यूच्यूअल फंड लेने बेचने का काम करने को कहां था. उस में हर मिनिट उस के भाव के पीछे भागने की जरूरत नहीं थी. 

        उस की मुलाक़ात NGO में स्नेहा से हुई थी. वह हr घड़ी सुंदर के आसपास रहती थी  और ज़ब चाहे तब सुंदर को मोबाइल पर भाव बताती थी.

         दोनों की आपस मैं अच्छी बनती थी. नीला दोनों का बड़ा ख्याल करती यहीं. उन की त्रिपुटी NGO में चर्चा का विषय बनी हुई थी.

         गरिमा उन दोनों की शादी करवाना चाहती थी.. स्नेहा भी उस के लिये तैयार थी. लेकिन तब उसे उस के अतीत के बारे में पता चला था. और सारी बाजी पलट गई थी. सुंदर उस से दूर होना चाहता था. लेकिन स्टोक मार्केट की वजह से उसे लगा रहा था.

       स्नेहा ने उसे हर तरह का साथ दिया था. लेकिन सूंदर को किसी चीज में विश्वास नहीं था. स्नेहा किसी पुरुष से बात करे वह भी झेल नहीं पाता था.

        वह चालीस के पर हो चूका था, वैवाहिक सुख उस की जरूरत थी जो ना मिलने पर उस पर विपरित असर हुई थी. वह पुरी तरह से हताश हो चूका था, उसे कोई चीज में दिलचस्पी नहीं थी. उस का दिमाग़ पुरी तरह से विकृत हो गया था. नकारात्मक स्वभाव उसे अपने दादा और मा से वारसे में मिला था.

       नीला उस को समझने की कोशिश करती थी.. उसे एक मा का प्यार देती थी. लेकिन उसे किसी की कदर नहीं थी.

        वो जो सोचता था वही उस के लिये सच बन जाता था. वह किसी की बात नही मानता था.

         डोक्टर ने सीधा उसे मूंह पर कह दिया था.

          " तुम्हारी आँखों की रौशनी चली जायेगी. तुम कुछ भी नहीं कर पाओगे! "

        उस की बातों से वह पुरी तरह टूट गया था. उस ने अपने पैरों पर खुद कुल्हाड़ी मारी थी.

        वह शुरू से ही नकारात्मक था. मेरी पिताजी और आरती भी उसी कक्षा में शामिल थे  मैंने उसे बहुत समझाया था.

        उसे ब्लाइंड इंस्टिट्यूट में भी भर्ती किया था. वहाँ उसे बहुत सिखाया गया था.

         उसे सब से अहम बात बताई गई थी.

          " अपनी कमजोरियो का स्वीकार करो. उसे छिपाओ मत. "

           लेकिन उस ने इस बात को स्वीकारा नहीं था. वह देख नहीं पाता था. इस स्थिति में मैं उसे इंस्टिट्यूट में छोड़ने लेने जाता था. यह देखकर प्रशिक्षक ने मुझे कहां था.

        " आप उसे छोड़ने मत आइये. उसे खुद अकेला आने दीजिये. "

         मैंने उन की बात मानी थी. मैं उसे गाड़ी में बैठाता था. शाम को स्टेशन से पिक अप करता था. और वह अपने दोस्तों के साथ इंस्टिट्यूट जाता था. और शाम को स्टेशन पर उतरता था.

        उस को सही सिखाया गया था. अपनी कमजोरी मत छुपाओ. लोगो को जानने दो. तो वह तुम्हे सहाय करेंगा. 

         उस का प्रमाण पत्र के रूप में दादर रेलवे स्टेशन पर एक लड़की उसे सीढ़ियों पर चढ़ते समय मिल जाती थी. वह उस का हाथ पकडकर मदद करती थी.

          मैंने उसे तरह तरह से समजाया था.

          " हमारी सोच ही हमारी जिंदगी का निर्माण करती हैं. "

          दो लड़को ने खिड़की से बाहर देखा, एक ने फूल देखा और दूसरे ने कीचड. यह किसकी गलती थी?

         इंस्टिट्यूट में रोजाना एक प्रार्थना होती थी.

         ' इतनी शक्ति हमें देना दाता   

          मन का विश्वास कम होना,

           हम चले नेक रस्ते पर हम से

           भूल कर भी कोई भूल हो ना

          यह एक फ़िल्म का गीत था. मैंने उस को अपने जीवन में उतार लिया था. लेकिन उस ने उस प्रार्थना के शब्दों  पर ज्यादा दयान नहीं दिया था.

          हम ना सोचे हमें क्या मिला हैं

          हम ये सोचे किया क्या हैं अर्पण

        यह अमरिका के महान राष्ट्र पति जोन केनेड़ी के शब्द थे : जिन्होंने कहां था.

        यह मत पूछो तुम्हारा देश

        तुम्हारे लिये क्या कर सकता हैं

        पूछो तुम अपने देश ke

        लिये क्या कर सकते हो

                       000000000000 ( क्रमशः )

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