Maharaja Ranjit SIngh - 8 in Hindi Biography by Sudhir Sisaudiya books and stories PDF | महाराजा रणजीत सिंह - भाग 8

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महाराजा रणजीत सिंह - भाग 8

महाराजा की रानियाँ और परिवार

अपने जैसे अन्य महान् सैनिकों की ही भाँति रणजीत सिंह भी नारी की मोहिनी शक्ति के समक्ष दुर्बल थे। यही कारण है कि उनके जीवन में काफी बड़ी संख्या में नारियों का स्थान रहा—कई उनके 'जनाना' या अंतःपुर की अंग थीं, पर कुछ उससे बाहर भी। राजकुमार दलीप सिंह ने, कहा जाता है, 1889 ई. में एक फ्रांसीसी पत्रकार को बताया था कि, 'मैं अपने पिता की 46 रानियों में से किसी एक का पुत्र हूँ।' कुछ इतिहासकारों के अनुसार, यह संख्या इतनी बड़ी नहीं थी, पर इससे कुछ अधिक अंतर नहीं पड़ता। असलियत यही है कि रणजीत सिंह ने कई शादियाँ तो बाकायदा की थीं, पर ऐसी स्त्रियाँ भी कम नहीं थीं जो सामाजिक बंधनों से बाहर रहकर भी उनके अत्यंत निकट थीं। उनके स्वच्छंद और उन्मुक्त यौन-जीवन की टीका करने वालों को उनका जमाना नहीं भूलना चाहिए और न इस बात को कि ऐसे मामलों में राजाओं और नवाबों के प्रति समाज का आम रुख क्या था? नारी का 'सतीत्व' इतना अधिक महत्वपूर्ण नहीं था, खासतौर से जबकि उसके ऊपर उस व्यक्ति की कृपादृष्टि हो जाए जो स्वयं महाराजा था। उसके साथ संपर्क स्थापित होने में गर्व की भी बात थी और प्रतिष्ठा की भी। इस प्रकार जबकि कुछ स्त्रियाँ 'चद्दर अंदाजी' के बाद रणजीत सिंह की शादीशुदा रानियाँ बनी थीं, कुछ ऐसी भी थीं जो उन्हें पसंद आ जाने पर उनकी उपपत्नियों के रूप में उनके हरम या अंतःपुर में आ पहुँची थीं। इनकी मिली-जुली सूची इस प्रकार है :

महताब कौर:

विवाहिता रानियों में पहली थीं महताब कौर। रणजीत सिंह के बुजुर्गों द्वारा किया गया यह संबंध उनके लिए बहुत ही प्रतिष्ठाजनक सिद्ध हुआ, क्योंकि इसके कारण शुक्करचकिया और कन्हैया सरदारों के बीच नाता जुड़ा। महताब की माँ सदाकौर एक विलक्षण महिला थीं। अपने 'मिस्ल' की मुखिया तो वह थी हीं, अपनी योग्यताओं के कारण भी सच्चे अर्थों में सरदारनी थीं। महताब कौर की शादी 1796 ई. में हुई और मृत्यु 1813 ई. में।

राज कौर:

नकई सरदार राम सिंह की बेटी राज कौर का विवाह रणजीत सिंह के साथ 1796 ई. में हुआ था, और बताया जाता है कि रणजीत सिंह का उन पर विशेष पक्षपात था। वह भी महाराजा को प्रेम करती थीं और उन्हें ठीक-ठीक समझती भी थीं; उनकी सारी रानियों में वही उनके सबसे अधिक निकट पहुँच पाई थीं। 1802 ई. में उन्होंने खड़क सिंह को जन्म दिया; वही अपने पिता के बाद उनके स्थान पर महाराजा हुआ। राज कौर की मृत्यु 1838 ई. में हुई।

बीबी मोरां

सन् 1805 ई. में जब तीन साल की ही उम्र में राजकुमार खड़क सिंह की सगाई एक कन्हैया सरदार की शिशु कन्या के साथ हुई थी, तब बड़ी खुशियाँ मनाई गई थीं। उसी सिलसिले में एक नाच के वक्त मोरां नाम की एक नाचने वाली लड़की की ओर महाराजा जोरों से खिंच गए। उसे उनके हरम में शीघ्र ही दाखिल कर लिया गया जहाँ वह उनकी विशेष कृपापात्री बनकर रही। दरअसल, परदा न करने के कारण, वह अकसर ही महाराजा के साथ बाहर दिखाई देती थी। यही नहीं, रणजीत सिंह ने उसके सम्मान में एक सिक्का तक चला दिया था; इस ‘आरसी वाले सिक्के' पर मोर का चित्र अंकित था, क्योंकि 'मोरा' मोर का ही पंजाबी बहुवचन है। इस नर्तकी का मोर-नाच विशेष रूप से विख्यात था। एक बार तो, मेटकाफ के अनुसार, महाराजा इसीलिए अमृतसर लौटने के लिए अधीर हो उठे थे कि मोरां की याद उन्हें बुरी तरह सता रही थी। सोहन लाल अनुसार, रणजीत सिंह ने स्वयं भी एक बार यह स्वीकार किया था कि मोरां का बिछोह वह पलभर के लिए भी नहीं सह सकते। एक बार तो वह हिंदुओं के तीर्थस्थान हरिद्वार भी उनके साथ गई थीं। होली के अवसर पर उनके साथ हाथी पर उसकी भी सवारी निकलती थी।

गुल बेगम:

मोरां के अलावा रणजीत सिंह की और भी कई मुसलमान रानियाँ अथवा उपपत्नियाँ थीं। इनमें से एक अमृतसर की एक वेश्या गुल बहार बेगम थी, जिसके साथ 1833 ई. में उन्होंने बड़ी धूमधाम और विधि के साथ शादी की थी। विवाह की सभी पुरानी रस्में पूरी की गई थीं; बल्कि रणजीत सिंह ने अपने इस कृत्य के लिए स्वर्ण-मंदिर में जाकर क्षमा-याचना भी कर डाली थी। मोरां की ही तरह गुल बेगम की भी सवारी महाराजा के साथ निकलती थी और कई साल तक महाराजा पर उनका काफी प्रभाव रहा।

अन्य मुसलमान रानियों के नाम हैं—जींद कलां, टीबू, जन्नत बीबी और गोबे।

रानी जिंदां:

महाराजा के कुत्ताघर के रखवाले मन्नासिंह की बेटी जींद कौर के बारे में यह माना जाता है कि अपने नाच और स्वाँग से उसने महाराजा को रिझा लिया था और उनके अंतःपुर में पहुँचा दी गई थी। बाद के वर्षों में गद्दी पर बैठने वाले दलीप सिंह की माँ वही थीं।

जिन अन्य रानियों के बारे में उल्लेख मिलता है वह थीं, गुजरात के भंगी सरदार की विधवा स्त्रियाँ रत्न कौर और दया कौर। इनमें से पहली राजकुमार मुल्ताना सिंह की माँ थीं और दूसरी राजकुमार कश्मीरा सिंह और पेशोरा सिंह (कश्मीर और पेशावर की विजय की स्मृति में दिए गए नाम) की; चाँद कौर; लछमी; रूप कौर; कांगड़ा के राजा संसार चंद कटोच की बेटियाँ महताब देवी और राजबंसो; राज देवी; हर देवी; देवनो; राम देवी; रानी देवी; सुमन कौर; गुलाब कौर; बन्नत; दन्नो।

खड़क सिंह:

महारानी राज कौर की कोख से खड़क सिंह का जन्म सन् 1800 ई. में हुआ था। अगले साल ही रणजीत सिंह ने बैसाखी के दिन विधिपूर्वक अभिषेक करके युवराज बना दिया। शिशु के मस्तक को अभिषिक्त करने के बाद हाथी पर बिठा कर लाहौर की सड़कों पर उसकी सवारी निकाली गई और लोगों ने उस पर धन निछावर किया। रात को आतिशबाजी और रोशनी की गई। तीन वर्ष की उम्र में ही उसकी सगाई कन्हैयों के सरदार जेमल सिंह की लड़की चाँद कौर के साथ कर दी गई। 1812 ई. में महाराजा ने बड़ी धूमधाम के साथ उसकी शादी की; बारात गुरदासपुर जिले में फतेहगढ़ गई। युवराज ने मुलतान, कश्मीर और मजारियों के खिलाफ होने वाली लड़ाइयों में अपने पिता का साथ दिया। रणजीत सिंह की मृत्यु निकट आने पर खड़क सिंह उनकी जगह राजगद्दी पर बैठे और राजा ध्यान सिंह उनके वजीर बनाए गए। कहा जाता है कि स्वयं प्रधानमंत्री ने अपने स्वामी के विरुद्ध साजिश करके अफवाह फैला दी कि महाराजा अंग्रेजों से मिल गए हैं, और इस तरह खड़क सिंह तथा उनके पुत्र नौनिहाल सिंह के बीच झगड़े और संदेह के बीज बो दिए। महाराजा को थोड़ा-थोड़ा करके विष दिया जाता रहा, और पाँच नवंबर, 1850 को उनकी मृत्यु हो गई।

सरदारों में से कितनों का ही समर्थन प्राप्त रहने पर भी खड़क सिंह अपने पिता के योग्य उत्तराधिकारी नहीं सिद्ध हुए। उनमें न वे गुण ही थे और न वह महानता ही। अपने समकालीन लोगों से उन्हें कुछ विशेष प्रशंसा नहीं प्राप्त हुई। अपने पिता की ओर से कुछ लड़ाइयों का नेतृत्व उन्होंने अवश्य किया था, पर नेतृत्व के गुण उनमें नहीं थे। वह सरल-चित्त और आलसी प्रकृति के थे, और सारा राज-काज उन्होंने जमादार खुशहाल सिंह के भाई भैया राम सिंह पर छोड़ रखा था। रणजीत सिंह चाहते थे कि वह अपनी जागीर में ज्यादा दिलचस्पी लें, क्योंकि उसके प्रबंधक द्वारा गबन किए जाने की खबरें उन तक पहुँचती रहीं थीं। सन् 1816 ई. में उन्हें राम सिंह की गिरफ्तारी का हुक्म देने और खुले दरबार में खड़क सिंह से यह कहने के लिए मजबूर होना पड़ा कि वह उसकी जगह किसी अधिक योग्य और विश्वासपात्र आदमी को नियुक्त करें, पर पुरानी व्यवस्था फिर चालू हो गई।

एक स्रोत के अनुसार, ईश्वर-आराधना और साधु-संतों के सत्संग की ओर खड़क सिंह की विशेष रुचि थी और लौकिक महत्वाकांक्षा उनके अंदर बहुत कम थी। संभवतः किसी ऐसे विशिष्ट पूर्वज की प्रकृति उनमें प्रतिफलित हुई थी जो लौकिक जीवन के प्रति उदासीन था।

नौनिहाल सिंह

खड़क सिंह के बेटे नौनिहाल सिंह का जन्म 22 फरवरी, 1822 ई. को हुआ था। रणजीत सिंह को इतनी खुशी हुई थी कि बधाई देने के लिए आने वाले सरदारों, जागीरदारों और अमीर-उमरा को बिठाने के लिए उन्होंने जो शामियाना लगवाया था उसके खंभे सोने के थे। सन् 1837 ई. में उन्होंने अपने पोते की शादी ऐसी शान-शौकत के साथ की कि हर जगह उनका जय-जयकार होने लगा। नौनिहाल सिंह को राजा ध्यान सिंह ने उनके पिता महाराजा खड़क सिंह के विरुद्ध भड़का दिया था और उनकी मृत्यु उसी दिन हुई जिस दिन खड़क सिंह की चिता में आग लगी। दाह-संस्कार के बाद जब वह लौट रहे थे, तब एक दरवाजे की मेहराब उन पर टूट कर गिर पड़ी। माना यही गया कि वह 'दुर्घटना' ध्यान सिंह द्वारा ही कराई गई थी और उन्हीं के इशारे पर नौनिहाल सिंह उसी दम पालकी में डाल कर महल में ले जाए गए थे, जहाँ उनके पहुँचने पर, कहा जाता है उनकी हत्या करा डाली गई।

शेर सिंह:

शेर सिंह महताब कौर के जुड़वाँ बेटों में से एक थे। उनकी नानी सदाकौर को रणजीत सिंह ने, अपने प्रति उनकी शत्रुता के कारण, बाद में नजरबंद करा दिया था, और इसलिए खड़क सिंह की शादी में न वह खुद शामिल हुई थीं और न उनका एक भी दौहित्र। पर एक वक्त ऐसा भी आया था जब शेर सिंह रणजीत सिंह के कृपापात्र बन गए थे और खड़क सिंह पर से उनकी कृपादृष्टि हट गई थी।

खड़क सिंह और नौनिहाल सिंह दोनों की ही मृत्यु हो जाने पर शेर सिंह लाहौर पहुँचे। इस बीच खड़क सिंह की विधवा रानी ने गद्दी पर अपना दावा पेश कर दिया, और शेर सिंह मुकेरियाँ लौट गए। 1842 ई. में जरूर वह कुछ वक्त के लिए महाराजा बने, पर ध्यान सिंह को वह अपने रास्ते से हटाने की योजना ही बना रहे थे कि 15 सितंबर, 1843 ई. को अजित सिंह संधनवालिया ने गोली मारकर उनकी हत्या कर दी। उसी दिन ध्यान सिंह की भी इसी तरह हत्या हुई।

दलीप सिंह

रणजीत सिंह के सातवें पुत्र दलीप सिंह का जन्म 1838 ई. में रानी जिन्दां के गर्भ से हुआ था। वह मुश्किल से छह साल के रहे होंगे, जबकि शेर सिंह की मृत्यु के फलस्वरूप उन्हें महाराजा घोषित किया गया। उनकी माँ रीजेंट बनी और ध्यान सिंह के पुत्र हीरा सिंह वजीर हुए। नए महाराजा के सौतेले भाइयों कश्मीरा और पेशोरा ने उनके विरुद्ध विद्रोह कर दिया, पर वह विफल हुआ। हीरा सिंह बड़े ही उदंड स्वभाव के थे; उनकी तथा उनके सलाहकार पंडित जल्ला की, 1844 ई. में खालसा सेना द्वारा हत्या कर दी गई। अब जिन्दां के भाई जवाहर सिंह प्रधानमंत्री हुए, पर राजकुमार पेशोरा सिंह की हत्या में भाग लेने के जुर्म में जवाहर सिंह को 21 सितंबर, 1845 को मृत्यु-दंड दिया गया।

इस गृह-कलह के फलस्वरूप, और लॉर्ड डलहौजी की विस्तारवादी नीति के कारण, पंजाब शीघ्र ही अंग्रेजों के हाथों में चला गया। जींद कौर नेपाल भाग गई और महाराजा दलीप सिंह को फतेहगढ़ (उत्तर प्रदेश में) ले जाया गया, जहाँ वह 1853 ई. में ईसाई हो गए। अगले साल वह इंग्लैंड चले गए, जहाँ उन्होंने करीब-करीब सारी ही बाकी जिंदगी गुजारी। दो ही बार फिर वह अल्पकाल के लिए भारत आए—1861 ई. में अपनी माँ को अपने साथ ले जाने के लिए और 1863 ई. में मातृभूमि में उनका दाह-संस्कार करने।

कोई 23 साल बाद, ब्रिटिश सरकार के साथ तीव्र मतभेद हो जाने के कारण, दलीप सिंह ने भारत के लिए जहाज लिया, किंतु अदन में उन्हें रोक लिया गया और ब्रिटेन वापस जाने के लिए कहा गया। कुछ काल के लिए ही यहाँ रहते हुए उन्होंने फिर सिख धर्म ग्रहण कर लिया। अपने जीवन के आखिरी साल उन्होंने यूरोप में बिताए और 1893 ई. में पेरिस में उनकी मृत्यु हुई। अपने पीछे वह दो लड़के और तीन लड़कियाँ छोड़ गए।

सदा कौर

रणजीत सिंह के साथ कोई सीधा रिश्ता न होने पर भी सदाकौर का उनके राज्य-काल के प्रारंभिक वर्षों में एक महत्वपूर्ण स्थान था। उनके पिता की मृत्यु एक मुठभेड़ में, 1791 ई. में रणजीत सिंह के ही पिता के हाथों हुई थी, फिर भी उनकी महत्वाकांक्षा इतनी अधिक थी कि इस बात को उन्होंने नजरंदाज कर दिया और इस नौजवान सुक्करचकिया सरदार के साथ खुद ही अपनी बेटी महताब कौर के विवाह का प्रस्ताव पेश किया। इस शादी के बाद वह भी महताब के साथ-साथ गुजरानवाला आकर रहने लगी, ताकि नवदंपत्ति के हितों की रक्षा कर सकें। यों उनके वहाँ आकर रहने से वर-वधू के बीच संबंध खराब ही होते गए, पर रणजीत सिंह को उन्होंने भावी नेतृत्व के लिए अवश्य तैयार किया। उनके उत्थान में उन्होंने हरसंभव तरीके से मदद की और साथ-साथ मन में यह आशा रखी कि वक्त आने पर रणजीत सिंह को वही अपने इशारे पर चलाएगी—यह वह जानती थी कि स्त्री होने के नाते वह खुद खुल्लम-खुल्ला नेतृत्व करने के लिए आगे नहीं बढ़ सकती। उनका अपना स्वार्थ भी इसी में था। वह समझती थी कि रणजीत सिंह से समर्थन पाकर कन्हैया मिस्ल का वास्तविक नेतृत्व उनके अपने ही हाथ में रहेगा। वह बटाला में रहने लगीं और अपने उद्देश्य की सिद्धि के लिए उन्होंने एक अच्छी-खासी फौज भी रख ली।

पर उनकी योजनाएँ गुजरानवाला में उलट-पलट गईं। रणजीत सिंह को अपने प्रभाव में रखने के उनके प्रयत्नों से उलटे महाराजा की माँ के साथ ही उनकी अनबन होने लगी, जिसके फलस्वरूप उन दोनों महिलाओं के बीच जबर्दस्त झगड़ा हो गया। बीच में थोड़े वक्त के लिए, 1796 और 1797 ई. में जबकि शाह जमन की चढ़ाइयाँ हुईं, इस मोर्चे पर शांति-सी रही। उस बीच अस्थायी तौर पर सदाकौर की ही चढ़ बनी। कारण, उन्होंने ही सिख सरदारों को रणजीत सिंह के नेतृत्व में अफगानों का डटकर मुकाबला करने के लिए तैयार किया था। पर यह खतरा बीत जाने पर रणजीत सिंह ने अचानक एक दूसरी शादी कर डालने का फैसला कर लिया। उन्होंने यह भी तय कर लिया कि सारा राजकाज वह अपने हाथ में ले लेंगे। खीझकर सदाकौर उन्हें छोड़ चली गई और अपनी बेटी को भी अपने साथ बटाला लेती गई, पर भाग्य ने फिर भी हस्तक्षेप किया। लाहौर के नागरिकों ने रणजीत सिंह और सदाकौर से अपनी मदद के लिए आने का अनुरोध किया। अमृतसर के हिंदुओं की ओर से भी इसी तरह का अनुरोध किया गया। फलस्वरूप इस नौजवान सुक्करचकिया सरदार को इन दोनों ही नगरों का प्रभुत्व मिल गया। 

दूसरी महारानी के गर्भ से खड़क सिंह और महताब कौर के गर्भ से जुड़वाँ बच्चों के जन्म ने रणजीत सिंह और उनकी सास के आपसी संबंधों को एक बार फिर बिगाड़ना शुरू किया। सदाकौर यह चाहती थी कि उन्हीं के दोनों दौहित्रों में से एक को युवराज बनाया जाए। उनकी यह इच्छा जब पूरी नहीं हुई तब वह उन जुड़वाँ बच्चों को अपने पास बटाला ले गईं और उनकी ओर से रणजीत सिंह के सामने माँग पर माँग पेश करती रहीं। राजकुमार शेर सिंह यों दरबार में अच्छे-खासे चमक रहे थे, पर रणजीत सिंह ने अपने प्रथम पुत्र को ही युवराज बनाया। सदाकौर ने जब अंग्रेजों के साथ मिल जाने की कोशिशें कीं, तब रणजीत सिंह ने उन्हें गिरफ्तार करके उन कोशिशों को व्यर्थ कर दिया, और उनकी आधी संपत्ति उनके दौहित्रों को दिला दी। उनकी मृत्यु बंदी अवस्था में ही हुई।