प्रारंभिक विजय-अभियान
बात इतनी पुरानी हो चुकी है कि औसत पाठक को रणजीत सिंह के उन विभिन्न विजय अभियानों के विस्तृत ब्यौरों में शायद ही कोई खास दिलचस्पी हो, जिनके फलस्वरूप अंत में वह पंजाब के महाराजा बन पाए। फिर भी, किसी आदमी को उसके कामों से अलग करके नहीं देखा जा सकता, और इसलिए उनकी जीवन-कथा के महत्व को ठीक-ठीक आँकने के लिए उन विजय अभियानों का भी थोड़ा-बहुत विवरण देना आवश्यक है।
बार-बार भारत पर आक्रमण करने वाले अहमद शाह अब्दाली के पोते शाह जमन ने दुर्रानी के ही कदमों पर चलने की कोशिश करते हुए 1795 ई. में झेलम तक धावा बोल दिया। 1797 और 1798 ई. में वह और भी आगे बढ़ आया, और सिखों के किसी जबर्दस्त प्रतिरोध के अभाव में, लाहौर में दखल कर गया। सच पूछा जाए तो इन सिख सरदारों में से कुछ ने अफगान हमलावर के साथ समझौता कर लेने में ही अपना फायदा देखा जिसके बदले में उन्हें कुछ इलाके इनाम के तौर पर मिले भी, पर वापसी पर शाह जमन की 12 तोपें झेलम की बाढ़ में डूब गईं। रणजीत सिंह ही पंजाब के इस इलाके के स्वामी थे, और इसलिए अफगान शाह ने उन्हें इस शर्त पर लाहौर, और 'राजा' की उपाधि भी देने का वादा किया कि वह उनकी डूबी हुई तोपों को निकाल कर उन तक पहुँचा दें। रणजीत सिंह ने आठ तोपों को बरामद किया और उसके पास पेशावर भिजवा दिया। वादा पूरा जरूर किया गया, लेकिन शहर पर रणजीत सिंह को अपनी ही कोशिशों से कब्जा करना पड़ा।
लाहौर
लाहौर के उस वक्त के सिख शासक लंपट, व्यभिचारी और अय्याश थे, और जनता उनके अत्याचारों से ऊब चुकी थी। बख्शीश मिलने वाली इस बात के फैल जाने पर रणजीत सिंह को पता चला कि जनता अपने उद्धारक के रूप में उनका स्वागत करेगी, इसलिए जब कूच करके वह छह जुलाई, 1799 ई. को शहर के नजदीक पहुँचे, तो उसके दरवाजे खोल दिए गए और उनकी आँखों के सामने ही भंगी सरदार भाग खड़े हुए। “उन्होंने (रणजीत सिंह ने खासतौर पर हुक्म दिया था कि शहर और उसके निवासियों के साथ विजेता सैनिकों द्वारा अच्छे-से-अच्छा बर्ताव किया जाए, और अगर उनमें से कोई भी लूटपाट या बुरा बर्ताव करता पाया जाएगा, तो उसे सख्त सजा दी जाएगी।” कुछ इतिहासकार दर्रानी की इस बख्शीश वाली बात को सही नहीं मानते और उनका खयाल है कि लाहौर को रणजीत सिंह अपनी सास सदाकौर की मदद से ले पाए, और इस कारण भी कि सुक्करचकियों के इस सरदार पर वहाँ के लोगों का विश्वास था। जो भी हो, नए शासक ने जनता को वही चीज दी जिसकी जनता को सबसे ज्यादा जरूरत थी, अर्थात् सुरक्षा। बेदखल किए जाने वाले भंगी सरदारों के साथ भी उन्होंने नरमी बरती और उन्हें बड़ी-बड़ी जागीरें दीं।
लाहौर पर रणजीत सिंह का कब्जा हो जाने से मुसलमान और सिख दोनों ही तरह के शासकों के अंदर ईर्ष्या की आग जल उठी, और उनकी शक्ति को चुनौती देने के लिए पड़ोस के कई शासक मिलकर एक हो गए। 1800 ई. में उन सबने मिलकर कसूर के निकट भसीन में उन्हें ललकारने के लिए एक बड़ी फौज इकट्ठी कर ली और यह भी चाहा कि अगर संभव हो, तो एक सम्मेलन में उन्हें बुलाकर उनकी हत्या कर दी जाए, पर यह योजना विफल हुई। आपसी ईर्ष्या-द्वेष बाधक सिद्ध हुए और इस षड्यंत्र के एक नेता गुलाब सिंह भंगी जब इतनी ज्यादा शराब पी गए कि उसके कारण वह मर ही गए तब वह षड्यंत्र भी बेकार हो गया।
जम्मू
अपने बुजुर्गों के दिखाए रास्ते पर चलकर अब रणजीत सिंह ने अत्यंत समृद्ध जम्मू शहर के दो कस्बों को जीत लिया। जम्मू के राजा ने उनका जागीरदार बनकर रहना स्वीकार कर लिया और उन्हें नकद खिराज दी। सियालकोट के रास्ते लौटते हुए उन्होंने कुछ भसीन सरदारों के संघों को, जो गुजरावाला पर चढ़ाई करने की ताक में थे, लड़ाई में हरा दिया। इसके बाद रणजीत सिंह की नजर कांगड़ा के राजा संसार चंद की ओर गई, जिन्होंने सदाकौर के कुछ पहाड़ी इलाके हथिया लिए थे। लड़ाई में संसार चंद की हार हुई, और नजराने के तौर पर उन्होंने नूरपुर उन्हें दे दिया।
1802 ई. में रणजीत सिंह ने चिन्योट को जीत लिया। इन्हीं दिनों जब कसूर के मुसलमान शासक ने ऊँटों के एक काफिले को लूट लिया, तो रणजीत सिंह और कन्हैया तथा अहलूवालिया मिस्लों के उनके मित्र सरदारों ने, उस पर अपनी बंदूकें तान दीं और उसे झुकने के लिए मजबूर कर दिया। 1803 ई. में इस नौजवान सुक्करचकिया सरदार ने मुलतान पर अपना हमला किया और उसके मुसलमान शासक मुजफ्फर खाँ को परास्त किया। झंग का अहमद खाँ भी उनका जागीरदार बनने के लिए विवश हुआ। अपनी इस कूच पर रणजीत सिंह रावलपिंडी तक जा पहुँचे थे और रास्ते में पड़ने वाले मुसलमान शासकों से खिराज की रकम वसूल करते चले गए।
एक साल पहले, 1801 ई. में, रणजीत सिंह के पहले बेटे (बाद को जिसका नाम पड़ा खड़क सिंह) का जन्म हुआ। इसकी माँ थी नकई राजकुमारी राजकौर। इस अवसर पर सारे राज्य में 40 दिन तक उत्सव मनाया गया। सिख जागीरदारों ने अब रणजीत सिंह को 'महाराजा' की उपाधि से विभूषित करने का निश्चय किया और इसी सौभाग्यशाली वर्ष में बैसाखी के दिन एक भारी दरबार में उनका यह राज्याभिषेक हुआ। इसके बाद से वह 'सरकार' कहकर संबोधित किए जाने लगे, पर उन्होंने जिन सिक्कों को जारी किया उन पर गुरु नानक और गुरु गोविंद सिंह के नाम थे। आज तक ये सिक्के 'नानक शाही' कहलाते हैं।
अमृतसर
भंगियों के जबर्दस्त गढ़ अमृतसर पर रणजीत सिंह का कब्जा कब हुआ, इसके बारे में इतिहासकारों के बीच मतभेद है। सोहन लाल सूरी के अनुसार, फरवरी 1805 ई. में यह घटना घटी। लेपेल ग्रिफिन का कहना है कि भंगी सरदार की विधवा स्त्री भाई सुखाँ के सामने रणजीत सिंह ने यह माँग पेश की कि भंगियों की मशहूर 'जमजमा' तोप वह उनके हवाले कर दें। यह तोप दुर्रानियों के साथ 1764 ई. में हुई लड़ाई में मिली थी और सारी लूट का बँटवारा होने पर रणजील सिंह के दादा चड़हत सिंह के हिस्से में आकर भी उन्हें मिल नहीं पाई थी, पर भंगियों ने इस तोप को अब भी देने से इनकार किया (अब यह लाहौर में संग्रहालय के सामने रखी हुई है), जिसके फलस्वरूप रणजीत सिंह ने अमृतसर पर हमला करके दो घंटे के अंदर उसे ले लिया। इस प्रकार अब अमृतसर और लाहौर दोनों ही उन्हें एक साथ मिल गए। एक सिखों का सर्वप्रथम धार्मिक केंद्र और दूसरा उनकी राजनीतिक राजधानी। सदाकौर और फतेह सिंह अहलूवालिया जैसे समर्थक भी उन्हें प्राप्त थे ही, और जम्मू तथा करार के अलावा और भी कितने ही स्थानों के शासकों से वट कर बसूल करने लगे। करीब-करीब यही वक्त था, जबकि अकाली फूला सिंह, जो बाद में महाराजा के सबसे ज्यादा वफादार सेनापतियों में गिने जाते थे, उनकी नौकरी में आए।
मराठे और अंग्रेज
सन् 1805 ई. में, जबकि झंग पर कब्जा करने के बाद महाराजा मुलतान की ओर बढ़े जा रहे थे, उन्हें खबर मिली कि जसवंत राव होलकर और पिंडारी सरदार अमीर खाँ पंजाब के अंदर घुस आए हैं और उनका पीछा अंग्रेज सेनापति लॉर्ड लेक कर रहे हैं, जिन्होंने व्यास नदी के पूर्वी तट पर खीमा गाड़ा है। रणजीत सिंह ताबड़तोड़ अमृतसर लौटे और होलकर तथा अंग्रेजों के प्रति अपनी नीति तय करने के लिए उन्होंने सिख सरदारों का एक सम्मेलन किया। उन्होंने सोचा कि शिकार और शिकारी दोनों ही अगर और आगे बढ़ आए, तो लड़ाई का अखाड़ा बनकर पंजाब बरबाद हो जाएगा। उन्होंने यह भी समझ लिया कि इन दोनों के बीच के झगड़े में अपने को फँसाने योग्य शक्ति अभी उनके अंदर नहीं है। इसलिए 'गुरमता' ने यही फैसला किया कि मराठों और अंग्रेजों के बीच समझौता कराया जाए। रणजीत सिंह के हस्तक्षेप के फलस्वरूप होलकर को दिल्ली से उस ओर के इलाके वापस दिला दिए गए। साथ ही साथ, समझौते की बातचीत ने लॉर्ड लेक और सिखों के बीच एक संधि का रूप लिया, जिसके अनुसार यह तय हुआ कि होलकर अपनी सेनाओं को अमृतसर से 30 कोस की दूरी पर ले जाएँगे और पंजाब के सरदारों का उनके साथ कोई वास्ता नहीं रहेगा। दूसरी ओर, लॉर्ड लेक ने अपनी ओर से यह गारंटी दी कि संधि की शर्तों पर जब तक अमल होता रहेगा, तब तक अंग्रेजी फौज सिख सरदारों के इलाके में नहीं घुसेगी और न उनकी किसी संपत्ति को हथियाएगी।
सर्वोच्च सिख शासक के रूप में अब तक रणजीत सिंह की स्थिति पंजाब में मजबूत हो चुकी थी। इसी हैसियत में उन्हें नाभा और पटियाला के बीच के भूमि संबंधी एक छोटे से विवाद का निपटारा भी करना पड़ा। उनका निर्णय पटियाला के पक्ष में रहा, पर नाभा को भी इसके बदले में कई गाँव दिलाए गए। जब वह उधर से लौटते हुए जालंधर पहुँचे, तो वहाँ राजा संसार चंद के भाई फतेह चंद नेपाली सेनापति थापा के खिलाफ उनसे मदद माँगने आ पहुँचे। जिसने कांगड़ा के किले पर घेरा डाल रखा था। महाराजा तुरंत ही ज्वालामुखी पहुँचे, और थापा को घेरा उठा लेने के लिए मजबूर हो जाना पड़ा। यहीं उन्हें अपनी पत्नी महताब कौर के गर्भ से पैदा होने वाले अपने दो जुड़वाँ बेटों (शेर सिंह और तारा सिंह) के जन्म की खबर मिली। वह उसी दम माथा टेकने के लिए अमृतसर के सिख मंदिर (जो दरबार साहब कहलाता है) पहुँचे ।
कसूर और मुलतान
कसूर का नया पठान शासक अपने बड़े भाई की मृत्यु के बाद बड़ा उदंड हो गया था। रणजीत सिंह ने उसे सबक देना जरूरी समझा और इस नगर को एक सिख जागीरदार के सुपुर्द कर दिया। पर पदच्युत शासक और उसके रिश्तेदारों के साथ अच्छा सलूक किया गया और उन्हें जागीरें दी गईं। मुल्तान के नवाब मुजफ्फर खाँ ने ही कसूर के नवाब को विद्रोह के लिए भड़काया था, और इसलिए उसे भी उसी तरह सबक दिया जाता, पर बहावलपुर के नवाब बीच में पड़ गए, और महाराजा को उससे हरजाना दिलाकर उन्होंने उसे बचा लिया।
फिर तो धीरे-धीरे और भी इलाके उनके अधिकार में आते ही चले गए। पटियाला की यात्रा के दौरान उन्हें नरायणगढ़ पर इसलिए दखल जमाना पड़ा कि वहाँ का राजा उनकी प्रभुता मानने को तैयार नहीं हुआ। रहों पर उसके शासक की मृत्यु पर उनका अधिकार हो गया, पर मृत शासक के लिए समुचित व्यवस्था कर दी गई। राज्य-विस्तार की यह प्रक्रिया चलती ही गई। 1808 ई. में रणजीत सिंह का प्रभुत्व पठानकोट, चंबा और बसौली पर भी जम गया, और कुछ ही समय बाद, सियालकोट और अखनूर पर भी। कितने ही सरदारों ने तो स्वेच्छापूर्वक महाराजा का आधिपत्य स्वीकार कर लिया, और जिन्होंने उनका मुकाबला करना चाहा, जैसा कि शेखूपुरा के शासक ने किया, वह भी देर तक नहीं टिक सके।
अंग्रेजों के मैत्री-प्रस्ताव
इधर महाराजा रणजीत सिंह की ताकत दिन-पर-दिन बढ़ रही थी और उधर जमुना से पूरब में ईस्ट इंडिया कंपनी का सितारा बुलंद हो रहा था। ऐसी स्थिति में सीस-सतलुज इलाके के सिख सरदारों ने समाना में एक सम्मेलन यह तय करने के लिए बुलाया कि वे किसका संरक्षण प्राप्त करें। उन्होंने जॉन कंपनी के पक्ष में फैसला किया और सन् 1808 ई. में दिल्ली स्थित ब्रिटिश रेजीडेंट को एक संयुक्त आवेदन-पत्र भेजा, जिसे उसने गवर्नर जनरल के पास कलकत्ता भेज दिया। रणजीत सिंह ने बुद्धिमानी इसी में देखी कि इन सरदारों को अपने खिलाफ न होने दिया जाए। अमृतसर में एक सम्मेलन करके उन्होंने उन्हें अपनी ओर से निश्चिंत कर दिया और इस दिशा में यहाँ तक आगे बढ़े कि पटियाला के महाराजा के साथ अपनी पगड़ी तक बदल ली, जोकि अटूट मित्रता का चिह्न था ।
भारत स्थित अंग्रेजों को जब नेपोलियन बोनापार्ट की योजनाओं का पता चला कि टर्की और ईरान की मदद से वह इस देश पर हमला करना चाहते हैं, तो अलग और तटस्थ रहने की अपनी नीति उन्होंने छोड़ दी। फ्रांसीसी सत्ता के विरुद्ध सुरक्षात्मक मैत्री की खोज में उन्होंने लाहौर, काबुल और तेहरान में शिष्टमंडल भेजने की व्यवस्था की। रणजीत सिंह के पास भेजे जाने वाले राजदूत चार्ल्स मेटकाफ ने सितंबर 1808 ई. में महाराजा से खेमकरन में मुलाकात की और फ्रांसीसियों के खिलाफ मदद माँगी, और इस बात की भी अनुमति चाही कि अगर नेपोलियन की योजनाओं को विफल करने के लिए अंग्रेजों को अफगानिस्तान पर हमला करने की जरूरत पड़ी, तो उनकी फौजें महाराजा के इलाके में से होकर गुजर सकें। महाराजा ने अपनी जवाबी शर्तें यह रखीं कि अंग्रेजों द्वारा सभी सिख राज्यों में उन्हीं को प्राथमिकता दी जाए, और महाराजा तथा काबुल के शासक के बीच मतभेद होने की स्थिति में अंग्रेज तटस्थ रहें। मेटकाफ को कोई भी वचन देने का अधिकार नहीं प्राप्त था, इसलिए उसने ये शर्तें गवर्नर-जनरल के पास भेज दीं।
अब रणजीत सिंह ने सीस-सतलुज इलाके के राज्यों में से कुछ को अपने राज्य में मिला लेने के लिए कुछ नई चढ़ाइयाँ शुरू कीं। इस बार के उनके धावे फरीदकोट, मलेरकोटला, अंबाला और शाहाबाद पर हुए। फ्रांसीसियों के हमले का खतरा इस वक्त तक खत्म हो चुका था, इसलिए अंग्रेजों ने इन चढ़ाइयों को कुछ कड़ी नजर से देखा। दक्षिण के सिख राज्य भी घबराकर उनकी शरण पहुँचे थे। फलस्वरूप महाराजा की महत्त्वाकांक्षा पर अंकुश लगाने के लिए अंग्रेजों ने लुधियाना में अपनी फौजें भेज दीं। गवर्नर जनरल ने एक घोषणा जारी की, जिसमें रणजीत सिंह से कहा गया कि वह अपना शासन उन्हीं इलाकों तक सीमित रखें जो तब तक उनके अधिकार में थे, और जिन इलाकों को उन्होंने हाल ही में दखल किया था, उन्हें उनके पिछले मालिकों को लौटा दें। अंग्रेजों के आगे झुकना स्वभावतः महाराजा के लिए अप्रिय था, इसलिए उन्होंने 25 अप्रैल, 1809 ई. को उनके साथ एक संधि कर डाली। इस तरह उन्हें सिर्फ फुलकियाँ राज्यों वाला इलाका ही खाली करना पड़ा। इस समझौते के अनुसार न सिर्फ बाकी जीते हुए इलाके उनके पास रह गए, बल्कि उन्हें कुछ दूसरे इलाकों तक बढ़ने की भी आजादी मिल गई–सिंध नदी के उस पार पेशावर तक, और जम्मू व कश्मीर, कांगड़ा, शिवालिक पहाड़ियों और कुछ और भी राज्यों की ओर।