Maharaja Ranjit SIngh - 9 in Hindi Biography by Sudhir Sisaudiya books and stories PDF | महाराजा रणजीत सिंह - भाग 9

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महाराजा रणजीत सिंह - भाग 9

तड़क-भड़क और धूमधाम

सन् 1812 ई. में खड़क सिंह की शादी ने मेटकाफ का यह अनुमान सही साबित कर दिया कि, 'इस मौके पर जैसी धूमधाम और जितनी तड़क-भड़क होने वाली है वैसी कई साल से भारत में नहीं हुई होगी।' रणजीत सिंह ने अंग्रेज गवर्नर-जनरल को और सारे पंजाब के राजा-महाराजाओं और सरदारों को निमंत्रण भेजा। शादी में पटियाला, नाभा, जींद, कांगड़ा और कैथल के शासकों के अलावा गवर्नर-जनरल के प्रतिनिधि कर्नल ऑक्टरलोनी भी शामिल हुए। मुलतान और बहावलपुर के नवाबों को भी निमंत्रण गया था, और उनकी ओर से उनके घराने के कुछ लोग शादी में शामिल भी हुए थे। 

बारात में कई हजार आदमी थे, और हाथियों, ऊँटों और घोड़ों पर वे लोग लाहौर से अमृतसर पहुँचे। वहाँ से बारात गुरुदासपुर जिले के फतेहगढ़ को गई। उत्सव की तैयारी अभूतपूर्व थी और बहुत ही बड़े पैमाने पर वर के ससुर ने अतिथियों के सत्कार और मनोरंजन पर प्रतिदिन हजारों रुपया खर्च किया था। शादी के खर्च के मद में भी उन्होंने रणजीत सिंह को लगभग 50 हजार रुपया नकद दिया था, और अपनी बेटी के लिए जो भारी दहेज दिया वह अलग! अतिथियों को भी अच्छे-खासे उपहार दिए गए थे।

नौनिहाल सिंह की शादी
सरदार शाम सिंह अटारीवाला की बेटी के साथ 1837 ई. में रणजीत सिंह के पोते नौनिहाल सिंह की शादी में भी कुछ कम तड़क-भड़क नहीं थी। पानी की तरह रुपया बहाया गया था। पिछली बार की ही भाँति देशभर के अनेक गणमान्य व्यक्तियों को निमंत्रण भेजे गए थे, और गवर्नर-जनरल ने अपने प्रधान सेनाध्यक्ष सर हेनरी फेन को अपने प्रतिनिधि के रूप में शादी में शामिल होने के लिए भेजा था। अधिकांश जागीरदार और स्वाधीन नरेश शादी में आए थे। अनुमान यह लगाया गया है कि बारात में लगभग पाँच लाख आदमी थे, जिनमें से अनेक निमंत्रित नरेशों के सैनिक और परिवार थे। रणजीत सिंह के लोगों ने प्रत्येक अतिथि की सुख-सुविधाओं और मनोरंजन का ध्यान रखने के लिए बड़ा परिश्रम किया था।

फिर ये लोग बारात में अमृतसर गए। दरबार साहब (स्वर्ण मंदिर) में माथा टेक आने के बाद महाराजा ने स्वयं अपने हाथ से वर के सिर पर सेहरा बांधा। 'न्यौंदरा' या 'तंबोल' के वक्त गवर्नर-जनरल की ओर से उनके अंग्रेज प्रतिनिधि ने 11 हजार रुपये भेंट किए। अगली भेंट राजा ध्यान सिंह ने दी—सवा लाख रुपये की। कितने ही राजाओं और सरदारों ने इक्यावन-इक्यावन हजार रुपये चढ़ाए। हर जागीरदार के यहाँ से उसकी हैसियत के हिसाब से 'तंबोल' की रकम आई। यहाँ तक कि घुड़सवार और पैदल सेना के सैनिकों ने भी अपनी एक-एक महीने की तनख्वाह-दस-दस रुपये भेंट चढ़ाई। एक अनुमान के अनुसार 'तंबोल' की कुल रकम लगभग 17 हजार पाउंड थी; एक दूसरे अनुमान के अनुसार, एक करोड़ रुपये। नाच-गाने और खाने-पीने की तो कोई सीमा ही नहीं थी, और रणजीत सिंह ने इतने बड़े पैमाने पर सारी व्यवस्था की थी और इस तरह रुपया फूँका था कि जनसाधारण ने भी उन खुशियों और उत्सव में अपने घर जैसा हिस्सा लिया।

अमृतसर में दिन के तीसरे पहर पूरी सज-धज के साथ जब बारात निकली तो उसमें कई दर्जन सजे हुए हाथी थे और सैकड़ों ऊँट और घोड़े। हजारों सैनिक भी—रणजीत सिंह के भी और उनके अतिथियों के भी—बारात में निकले। महाराजा रत्न-जटित एक हौदे पर चढ़े हुए थे और सोने-चाँदी के सिक्के ऊपर से बरसाते जा रहे थे ।

बारात के अटारी पहुँचने पर सरदार शाम सिंह ने उसका बड़े समारोहपूर्वक स्वागत किया । पाँच लाख बारातियों में से एक-एक के ठहराने और सत्कार-मनोरंजन की उन्होंने समुचित व्यवस्था कर रखी थी। अंग्रेज प्रधान सेनाध्यक्ष के भतीजे लेफ्टिनेंट एडवर्ड फेन ने जो अपने चचा के ए.डी.सी. (परिसहायक) थे, इस शादी का अच्छा-खासा विवरण पेश किया है। उनके अनुसार, बड़े-बड़े मोतियों की लड़ों का बना सेहरा जब नौनिहाल सिंह के चेहरे पर से हटाया गया तब दिखाई पड़ा कि वह “एक दुबला-पतला बीमार-सा लगने वाला लड़का है जिसका चेहरा चेचक के दागों से बुरी तरह भरा हुआ है, हालाँकि यों वह अक्लमंद और तमीजदार लड़का ही जान पड़ता था।”

रात को नौ बजे विवाह-संस्कार शुरू हुआ और पंडितों ने मंत्रों को पढ़ा। इस बीच रणजीत सिंह और उनके विशिष्ट अतिथि सोने-चाँदी शास्त्रानुसार की कुरसियों पर बैठे मद्य-पान करते रहे और उनके सामने नाच होते रहे। विवाह संपन्न होने पर महाराजा ने एक लाख से अधिक ब्राह्मणों और भिखारियों को भोजन कराया, जिसके बाद प्रत्येक को एक-एक रुपया दक्षिणा में दिया।

वधू-पक्ष से मिला हुआ दहेज यों था : उत्तम कोटि के 101 घोड़े, 101 गायें, 101 भैंसें और 101 ऊँट, 11 हाथी और कितने ही प्रकार के अनेक गहनें; और 500 बढ़िया कश्मीरी शॉल। फेन ने अन्य चीजों के अलावा जिनका खास जिक्र किया है, वे थीं : “भोजन और स्नानादि के देशी प्रकार के पूरे बरतन और पात्र, जिनमें से प्रत्येक ही चाँदी का था और बड़ी खूबसूरत नक्काशी किया हुआ।”

मेजबान ने दुकानें लगा दी थीं जहाँ से अतिथि लोग अपनी जरूरत या पसंद की कोई भी चीज मुफ्त में ले सकते थे। इस तरह के स्वागत-सत्कार में जब एक पखवाड़ा बीत गया तब रणजीत सिंह और ज्यादा रुकने के लिए राजी नहीं हुए। और तब ठोस सोने की बनी पालकी में वधू को बिठाकर उसके माँ-बाप और संबंधियों ने उसे विदा कर दिया।

बारात जब लाहौर वापस पहुँची, तब महाराजा ने शालीमार बाग में एक भारी उत्सव का आयोजन किया। नाचनेवालियों ने जहाँ एक ओर अपनी कला (और रूप) की बहार दिखलाई, वहाँ दूसरी ओर रणजीत सिंह के यूरोपवासी अतिथि नर-नारियों ने एक-दूसरे के साथ नाच किया। सर हेनरी फेन और उसके साथियों को लाहौर की सैर कराई गई। उन्हें कोहेनूर हीरा और अन्य जवाहरात भी दिखाए गए।

रंगीन होली
दो दिन बाद ही होली का रंगीन त्यौहार आ रहा था, और महाराजा ने अपने अंग्रेज मेहमानों को उसके लिए रोक लिया। उन लोगों के लिए यह उल्लासपूर्ण त्यौहार एक नया ही अनुभव था। फेन के अनुसार, रणजीत सिंह अपने दरबारियों से घिरे हुए बैठे थे, और उन सबके बीच थीं धनुष-बाण लिए हुए 30-40 लड़कियाँ। तमाशे में शामिल प्रत्येक के सामने लाल और पीले रंग के अबीर के गोलों से भरी छोटी-छोटी पिटारियाँ थीं, जिनके बीच सोने की एक-एक लंबी पिचकारी थी। शुरुआत रणजीत सिंह ने सर हैनरी फेन की गंजी खोपड़ी पर केसर का पीला लेप करके की, और तभी राजा ध्यान सिंह ने उस अंग्रेज के चेहरे पर लाल अबीर मल दिया। रणजीत सिंह ने अफगान राजदूत को भी नहीं बख्शा और बड़े अच्छे ढंग से सँवारी गई उनकी दाढ़ी महाराजा की पिचकारी की लाल फुहार से बिल्कुल रंग गई। धीरे-धीरे औरों ने भी उस राजदूत पर हमले करने शुरू कर दिए और अंत में उस बेचारे को, भारी अट्टाहास के बीच, मंडल से भाग जाना पड़ा। अपने विवरण के अंत में फेन ने लिखा है : “जब तक हम अपने डेरों पर वापस लौटे, तब तक हममें से सभी इस कदर गंदे हो चुके थे कि लंदन के चिमनी साफ करने वाले (कोयले के धुएँ से काली चिमनी को साफ करने वालों का पेशा सबसे गंदा पेशा माना जाता है) भी अपने समाज में हमें शामिल करने को तैयार न होते।”

रूपड़ में बेंटिक के साथ
रणजीत सिंह जो कुछ करते थे धूम-धड़ाके से करते थे। कूटनीति की दृष्टि से जब अंग्रेजों से अच्छा संबंध स्थापित करने की जरूरत दिखाई पड़ी, तो महाराजा ने गवर्नर जनरल लॉर्ड विलियम बेंटिक से मिलने की तैयारी की। इस मुलाकात के लिए रूपड़ चुना गया और तारीख 26 अक्तूबर, 1831। उनके आदमियों ने सतलुज के किनारे इस काम के लिए खास तौर पर एक पड़ाव तैयार किया, जिसके बीच एक ऊँचे स्थान पर चाँदी का मंडप बनाया गया जो किसी हिंदू मंदिर जैसा दिखाई देता था।

16 हजार घुड़सवार फौज को अपने पीछे लिए रणजीत सिंह 25 को सवेरे रूपड़ पहुँचे। अगले दिन तड़के ही वह हाथी पर चढ़कर गवर्नर जनरल बेंटिक से मिलने के लिए चल पड़े, जहाँ उनके आदमियों ने उनकी अगवानी की। दोनों ही प्रमुखों ने एक-दूसरे को गले लगाया और फिर वे ब्रिटिश शिविर के अंदर दाखिल हुए, जहाँ 200 थालों में सजाई हुई उपहार-सामग्री महाराजा को भेंट की गई। उपहारों में दो हाथी और कई घोड़े भी थे। दुभाषियों के मार्फत वार्तालाप चलने लगा। उस दिन के कार्यक्रम का अंत अंग्रेजों के साथ लाई गई भारतीय नर्तकियों के नाच से हुआ।

कुछ अगले दिन सवेरे बेंटिक भी उसी तरह महाराजा से मिलने उनके यहाँ आए। महाराजा उनकी अगवानी करके एक ही हाथी पर उन्हें अपने साथ बिठा कुछ दूर तक लाए, और फिर गवर्नर जनरल को चाँदी के उस मंडप में ले जाया गया। पंजाबी तोपखाने ने 21 तोपों की सलामी दागी। महाराजा ने अपने सरदारों को बेंटिक के सामने पेश किया, और उन्होंने भी अपने अफसरों से रणजीत सिंह का परिचय कराया। इसके बाद कुछ देर तक कश्मीर की नर्तकियों का नाच चला। अब 100 थालों में सजाए गए महाराजा के उपहार गवर्नर जनरल को भेंट किए गए; इनमें एक हाथी और दो घोड़े भी थे। रणजीत सिंह ने व्यक्तिगत रूप से बेंटिक को मोतियों की एक लड़ी भेंट की।

इसके बाद दोनों प्रमुखों ने एक-दूसरे की फौजों का निरीक्षण किया। रात को महाराजा ने लॉर्ड और लेडी बैंटिक के सम्मान में एक पार्टी दी। बाहर आतिशबाजी छूट रही थी और शिविर के अंदर कश्मीरी लड़कियाँ अपना नाच दिखा रही थीं। शराब पानी की तरह बह रही थी और एक बार तो अतिथियों के ऊपर सोने का चूरा इस तरह बिखेरा गया जिस तरह होली में अबीर बिखेरा जाता है। इसके बाद दोनों पक्षों के बीच काम की बातें हुईं, लेकिन इस मुलाकात का परिणाम रणजीत सिंह और सिखों के लिए कुछ निराशाजनक ही रहा।

ऑकलैंड के साथ फीरोजपुर में
भारत-स्थित ब्रिटिश सत्ता ने जब यह तय किया कि रूसी खतरे का मुकाबला करने के लिए काबुल की गद्दी पर शाह शुजा को बिठाया जाए, तब उसने अपने इस काम में रणजीत सिंह को भी साझीदार बनाने की खासतौर पर कोशिश की। लॉर्ड ऑकलैंड के शिमला पहुँचने पर महाराजा ने वहाँ एक शिष्टमंडल भेजकर उसके द्वारा यह सुझाव पेश किया कि उनके और गवर्नर-जनरल के बीच बातचीत के लिए कोई बैठक की जाए।

आखिर तय हुआ कि वे दोनों नवंबर 1838 ई. के अंतिम सप्ताह में फीरोजपुर में मिलें। पहली बातचीत 29 तारीख को हुई। ग्रंथ साहब के सम्मुख प्रार्थना करने के बाद रणजीत सिंह पूरे जुलूस के साथ ब्रिटिश शिविर की ओर बढ़े। गवर्नर जनरल के शिविर के इर्द-गिर्द इतनी भीड़-भाड़ और इस कदर शोरगुल था कि दरबार के लिए आवश्यक वातावरण कायम रखने के लिए अंग्रेज सैनिकों को तैनात करना पड़ा।

सदा की ही भाँति इस बार भी गवर्नर-जनरल महाराजा के लिए उपहार लाए थे—अधिकतर बंदूक, पिस्तौल और तलवार जैसे शस्त्रास्त्र ही। दो तोपें भी भेंट की गईं, जिनसे रणजीत सिंह को खासतौर पर खुशी हुई इसलिए और भी कि उन पर उनकी अपनी आकृति खुदी हुई थी। और जब महाराजा को पता लगा कि लॉर्ड ऑकलैंड उनके लिए कुछ घोड़े भी लाए हैं तब तो उनके लिए वह इतने उतावले हो गए कि उसी दम उधर दौड़ पड़े और उन्हें तब तक चैन नहीं मिला जब तक कि अपने हाथों से उनके बदन को उन्होंने सहलाया नहीं। इसी तरह की भीड़भाड़ और शोरगुल तब देखा गया, जबकि गवर्नर-जनरल महाराजा के शिविर में आए।

रात को स्वागत-सत्कार के साथ ही कामकाज की बातचीत का भी सिलसिला शुरू हुआ। आतिशबाजियों और नाच के उस गुलगपाड़े के बीच ही रणजीत सिंह ने लॉर्ड ऑकलैंड को बताया कि काबुल के तख्त पर शाह शुजा को फिर से बिठाने की ईस्ट इंडिया कंपनी की योजना में शामिल होने के लिए वह राजी हैं। इसके फौरन बाद ही और भी कई नाच हुए और महाराजा के लिए तैयार की गई खास शराब निमंत्रित लोगों के सामने पेश की गई। लॉर्ड ऑकलैंड स्वयं शराब से परहेज करते थे और शिष्टाचार के नाते ही उन्होंने उसे दिखावे भर के लिए स्वीकार किया, पर उनकी बहन एमली ईडेन को वह इतनी खराब लगी कि रणजीत सिंह की आँखें बचाकर उन्होंने उसे चुपके से कालीन पर उड़ेल दिया। भाई-बहन दोनों पर ही इस मुलाकात की अच्छी छाप पड़ी। कुमारी ईडेन ने यह देखा कि महाराजा की प्रजा उन्हें बहुत प्यार करती है, और लॉर्ड ऑकलैंड की दृष्टि में, वह “हमारे मित्रों में सबसे अधिक शक्तिशाली और उपयोगी हैं।”