लगता नहीं की तब तलक सबर रख सकेंगे
कविता
ढोते हुए उम्मीद की बोझ
कही सांसे थम ना जाऐ
सीने के अंदर जो भी हरकत हो रहा है
वो दर्द बड़ी गेहरा है
केसे गुजारे सारी उमर इस दर्द मे हम
जीना पाएंगे उम्मीद के गम में हम
लगता है हमारी राहा अभी सुरु हुई है
मंजिल दुर बड़ी है
लगता नही की तब तक सबड़ रख सके गे
ज़िन्दगी की और खबड़ रख सके
खामुस होंठ हैं अब
निगाहें रहो की तरफ देख के ठहरा
ऐ गम इतना भारी हैं कदम थक गऐ
काधे झुक गए हैं
आराम नही है सांसे लेने की
उम्मीद की बोझ तलें इतना दब गऐं है
ढलते साम सुबह होने दुआं भी ना करते
आज रात ना गुज़रे यही हम रोज सोचते
आगर मंजिल नही है तो
सांसें यही थम जाऐ
बेबजा की दर्द क्यों हमे है सहना
हम दर्द में थक गऐ हैं
हमे अब चुप है रहना
चाहत नही जिने कोई
ना कोइ खुआईस बचा है अंदर
तो अब तलक धड़कन क्यों धड़क रहा
सांसें क्यो ना थम रहा है
डर है जिस बातो की वो अभी क्यों ना हो रहा है
हा। हा। हा।
मुझे मेरी मोत कियो ना आ रहा है