कलयुग की नारी...
हे...! नारी
तू क्यूं सहमी है ?
तू क्यूं डरी है ?
अन्याय के विरुद्ध
दुष्टों के विपरित ,
यह तेरा युद्ध है ।
यह तेरा रणक्षेत्र ,
इसमें तू ही योद्धा है ।
तू ही तीर, कमान
तू ही अशस्त्र-शस्त्र ,
तू ही विजय रथ ,
लड़ भयरहित, अविरत ।
निर्भिक, साहसी बनकर ,
शब्दों की टंकार से
हिंसा के प्रहार से ,
प्रतिस्पर्धा की ललकार से
संघर्ष के अग्निपथ पर ,
ना..तुम रामायण, महाभारत की
सीता, अहल्या, द्रौपदी हो ,
हाँ..तुम सनातन कलयुग की
सशक्त, कुशल भारतीय नारी हो ,
जो ड़रकर नहीं डटकर
सहस्र बार मुकाबला करे
जो हारकर नहीं जीतकर ,
परिणाम को बदल डाले
जो अशक्य को शक्य बना दें !
वहीं तूं सर्व शक्तिमान ,
लिख इतिहास के पन्नों पर
यही तेरी पहचान है।
यह तेरी शौर्य गाथा है।।
©®- शेखर खराड़ी
तिथि -९-१०-२०२६