मैं और मेरे अह्सास
चलते चलते
उम्मीद के चलते चलते ज़ख्म भी मिल गये l
होठों से साथ साथ अरमान भी सिल गये ll
दुनिया में लोग तो राह ताकते है झगड़ने की l
जलने वालों के चहरे ख़ुशीयों से खिल गये ll
नए ज़माने के वक़्त की कैसी हवा लगी कि l
एकाएक बदले तो साथ में बदल दिल गये ll
सखी
डॉ दर्शिता बाबूभाई शाह