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Nilesh Rajput

Nilesh Rajput Matrubharti Verified

@nileshrajput842gmail.com162713
(1.4m)

अगर होता एक खून माफ,
तो तेरे जीवन के हर दर्द को हर लेता।

अगर होता दो खून माफ,
तो हर उस आईने का क़त्ल कर देता,
जो तेरे हुस्न पर अपना हक़ जताता।

अगर होता तीन खून माफ,
तो आसमान से वो हर सितारा गिरा देता,
जिस पर तेरी नज़र ठहर जाती।

अगर होता हर खून माफ,
तो इस ज़ालिम दुनिया को ही मिटा देता,
जो हमारे इश्क़ को गुनाह समझती है।

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लड़की ने प्यार में कुछ नही खोया,
खोया अगर प्यार तो नसीब में भी प्यार ही आया।

प्यार के इस त्योहार में शायद तुम मेरा ये खत नहीं पढ़ पाओगी..खैर खत के भी अब इतने मायने कहां बचे है तुम्हारी जिंदगी में....तुम्हारा हर वक्त अब इन सातों दिनों में बट चुका होगा। एक हाथ में गुलाब लिए, होठों पर आधी खाई हुई चॉकलेट, टेडी को गले लगाकर अपने प्यार का इजहार करते शादी तक साथ रहने के जूठे वायदे करती तुम उनके बाहों में लिपटी होगी। खैर ये तो मेरी कल्पना है, सच्चाई तो असल में ये है की तुम ढूंढ रही हो एक नया प्यार, एक नया सवेरा जहां तुम कुछ नए ख्वाब देख सको। खुदा भी तुम्हे नया प्यार जल्दी मिलाए इन दुआको के साथ हैपी वेलेंटाइन।

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बचा जो भी मुजमे वो तुझसे जुड़ा है,
ये कैसा है मंजर जो मुझसे खफा है,
ना मिलती है मंजिल ये वो रास्ता है,
कितना भी कह दो ये दिल कहां समझता है।

हरे जख्मों पर कोई मरहम लगा दे,
मरहम के वास्ते निगाहे ना मिला दे,

आसमां को जमीं से मिलवा दे,
खुदा दोबारा इश्क ना करा दे,
रांझा को तु हीर से मिलवा दे,
खुदा दोबारा इश्क ना करा दे।

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एक बिका हुआ पत्रकार

नेताओं की गोदी में, ये बैठे रहते हफ्ते चार,
दो कौड़ी के लालच में, यहाँ बिकते रहे पत्रकार,

गंदा पानी, टूटी सड़कें, सच के सामने ये मुँह छुपाते,
चाटुकारिता की हद तो देखो, अरावली तोड़ने के फायदे गिनाते,

झूठी सारी न्यूज़ फैलाकर, हक़ माँगने पर देशद्रोही कहलाते,
देशभक्तों को जेल में डालकर, खुद को विश्वगुरु कहलाते।

शिक्षा, रोज़गार की बातें छोड़कर, वंदे मातरम् पर बहस कराते,
हिंदू–मुस्लिम से मन भर गया, अब हिंदू–हिंदू को लड़वाते।

जनता सारी जाग्रत हुई, बिना डरे कहेंगी दिल की बात,
हिंदुस्तान की क़सम खाकर, मिलकर बदलेंगे यह सरकार।

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मैं छोड़ दूँ शिकायतेँ सभी तेरे लिए,
क्या तुम फिर भी झूठी क़सम खा पाओगी क्या?

मैं तेरे वास्ते ले लूँ एक मकान नया,
क्या तुम उन्हें अपना घर बना पाओगी क्या?

मैं वक़्त को रोक भी दूँ दो पल के लिए भी,
क्या तुम वक्त पे आ पाओगी क्या?

मैं कर भी लूँ इश्क़ तुझसे अभी,
क्या तुम फिर से बेवफ़ा बन पाओगी क्या?

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स्त्री की चाह कभी आज़ादी थी ही नहीं। उसकी चाह तो बस उन मर्यादाओं को तोड़ना थी, जो सिर्फ़ उसके लिए बनाई गई थीं। पुरुषने जो मर्यादा तोड़ी, अपना सुकून पाने के लिए,वही मर्यादा तोड़ना चाहती थी स्त्री।
आज़ादी का भ्रम दिखाकर आख़िरकार स्त्रीने मर्यादा की खींची लकीर को तोड़ ही दिया।

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उसे किसी और से मोहब्बत है,
और हमें उससे—
जिसे किसी और से मोहब्बत है।

अब वो नहीं वो ही चाहिए।♥️

बड़ा अजीब सा इश्क़ निभा रही है वो,
जिसे मंदिरों की राह कभी रास न आई,
आज उसी मोहब्बत के सजदे में,
वो मस्जिदों के दर तक झुक आई।

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