अनकही खामोशी: एक पिता का अधूरापन
"हम अक्सर अपने माता-पिता के 'प्यार न जताने' की शिकायत करते हैं। लेकिन क्या हमने कभी उस खामोशी को समझने की कोशिश की है जो एक पिता अपनी दिनचर्या और जिम्मेदारियों के शोर में छिपा लेता है? आज की यह कहानी एक ऐसे पिता की है, जो अपने परिवार के भविष्य के लिए अपनों से ही दूर हो गया। यह सिर्फ एक कहानी नहीं, बल्कि उन लाखों पिताओं का आईना है जो बोल नहीं पाते, पर अपने हिस्से का हर पल अपनों के सुरक्षित भविष्य के लिए समर्पित कर देते हैं।"
सुनील बरामदे में अखबार पर नज़रें गड़ाए बैठा था। आज उसकी तबीयत कुछ ठीक नहीं थी, लेकिन बरामदे में लगी घड़ी अपनी रफ्तार से टिक-टिक कर रही थी—मानो कह रही हो कि उसका काम पर जाने का वक्त हो गया है। सुनील ने एक नज़र घड़ी पर डाली, फिर पूरे घर में और अंत में घर के बाहर देखा, जहाँ से वह लोगों को रोज़मर्रा के जीवन-यापन के लिए भाग-दौड़ करते देख रहा था। वह सोच में पड़ गया कि कैसे लोग अपने परिवार को सुरक्षित करने के लिए बिना रुके और बिना थके काम करते हैं।
तभी पीछे से बेटे ने आवाज़ दी और थोड़ा डरते हुए बोला, "पापा... आज ट्यूशन की फीस देनी है।"
सुनील ने उसके चेहरे को गौर से देखा, जो थोड़ा डरा-सहमा लग रहा था। उसे देख सुनील सोचने लगा, "मैंने तो कभी इसे डांटा नहीं, हर ख्वाहिश पूरी की, फिर भी यह मुझसे इतना डरता है कि मन की एक छोटी सी बात कहने में भी हिचकिचाहट है।" बेटे ने फिर दबी आवाज़ में 'पापा' कहा। उस आवाज़ से सुनील अपनी सोच से बाहर आया और जेब से पैसे निकालकर उसे दे दिए।
पैसे लेकर बेटा रसोई की तरफ भागा, जहाँ उसकी माँ काम में लगी थी। वह माँ का पल्लू पकड़कर एक पाँच साल के बच्चे की तरह मनुहार करने लगा। सुनील यह सब बरामदे की खिड़की से देखकर मुस्कुरा तो रहा था, लेकिन उसके मन में बेटे की वह हिचकिचाहट अब भी शोर मचा रही थी और उसके दिल पर चोट कर रही थी।
वह बरामदे में लगी अपने परिवार की सुंदर तस्वीर को गौर से देखने लगा—जिसमें उसकी बेटी, पत्नी, बेटा और वह खुद था। वह सोचने लगा, आखिर क्या वजह रही होगी कि परिवार का सबसे ज़रूरी सदस्य होने के बावजूद वह सबसे दूर है? उसे याद आया कि जब बेटा एक-दो साल का था, तब वह अपनी माँ के साथ ज़्यादा वक्त बिताता था। सुनील उस समय बेटे को एक सुरक्षित भविष्य देने के लिए ऑफिस के ओवरटाइम में इतना व्यस्त था कि उसे समय ही नहीं दे पाया। जब बेटा पहली बार स्कूल गया, तब भी उसकी माँ ही उसके साथ गई थी। ऐसा नहीं है कि वह साथ जाना नहीं चाहता था, लेकिन उस दिन ऑफिस में एक बहुत ज़रूरी मीटिंग थी—जो सुनील के लिए इसलिए ज़रूरी थी क्योंकि उसी से वह अपने परिवार को एक बेहतर घर देने में मदद कर सकता था।
सुनील को रह-रहकर अपना व्यस्त होना और परिवार से दूर जाना याद आने लगा, और उसकी आँखों से न चाहते हुए भी आँसू छलक पड़े। तभी किचन की खिड़की से पत्नी ने आवाज़ दी, "सुनिए जी, नाश्ता कर लीजिए, ऑफिस के लिए देर हो जाएगी और तैयार हो जाइए।" उसकी आवाज़ से सुनील अपने ख्यालों से बाहर आया। उसने भागती हुई घड़ी की तरफ देखकर एक गहरी ठंडी सांस ली और तैयार होने के लिए कमरे की तरफ बढ़ गया।
एक एहसास
हम भी कभी-कभी अपनों से बिना कहे और न चाहते हुए भी दूर हो जाते हैं। ऐसा नहीं है कि हमें उनसे कोई शिकायत है या वे हमारे लिए ज़रूरी नहीं हैं, फिर भी न चाहते हुए दोनों उस खामोशी को नहीं तोड़ पाते।
आइए, एक कोशिश करते हैं उस खामोशी को धीरे-धीरे कम करने की…
☆अनामकार