क्या होता अगर किताबों का घर होता,
तो सोचो ज़रा, कैसा वो शहर होता।
किसी का आशियाना अधूरा, किसी का मुकम्मल होता,
किसी में बेवफ़ाई, किसी में मोहब्बत का इज़हार होता।
किसी के पन्नों में दर्द छुपा होता,
किसी में हँसता हुआ कोई ख़्वाब होता।
न जाने कितने पन्नों में बीता कल होता,
किसी में बिछड़ने का ग़म, किसी में मिलने का पल होता।
कुछ किताबें ख़ामोश होतीं, कुछ में शोर बेहिसाब होता,
कुछ में टूटे रिश्तों का ज़िक्र, कुछ में अपनों का साथ होता।
और हर किताब का अपना एक संसार होता—
कहीं अधूरी कहानी, तो कहीं हर किरदार मुकम्मल होता।
क्या होता अगर किताबों का घर होता,
तो शायद हर इंसान भी एक खुली किताब होता।