दिन भर की झूठी मुस्कान का नक़ाब अब उतार दिया है,
रात के सन्नाटे ने फिर से मुझे पुकार लिया है।
जो दर्द छुपाया था सीने में दुनिया की नज़रों से,
उस बहते हुए आँसू ने आज फिर मुझे थाम लिया है।
ना कोई शिकवा किसी से, ना कोई उम्मीद बाकी है,
इस अँधेरे कमरे में बस मेरी तन्हाई ही काफी है।
थक चुके हैं ख़्वाब भी इस दिल का बोझ उठाते-उठाते,
सो जाती हैं आँखें भी अब खुद को रोज़ बहलाते-बहलाते।
ऐ चाँद, तू ही दे-दे अपने सुकून की थोड़ी सी छाँव,
बहुत भारी लगने लगे हैं अब इस ज़िंदगी के पाँव।
good night ❤️............