सोचता हूं किस कदर बदल जाते है
मानवीय स्वार्थ से परिपूर्ण रिश्ते, जहां शब्दों की जरा सी आहट क्यों बिखेर जाती है जन्मो तक साथ देने वाले वादों की श्रृंखला को क्या यही था गीता का संदेश, रामायण की सीख प्रेम से बंधे ये रिश्ते स्वार्थ के विवश क्यों चकनाचूर कर देते है रिश्तों की भावनाओं को क्या ये भावनाएं द्रवित हृदय में फिर से विश्वास के साथ जुड़ पाएगी क्यों भूल जाते है लोग रिश्तों की डोरी को, और बिना सोचे उछाल देते है हवा में इस बात का पता भी है कि वो डोरी कभी हमारे पास लौट भी आएगी या बस मन में छोड़ जाएगी ग्लानि
सोचता हूं किस कदर बदल जाते है मानवीय स्वार्थ से परिपूर्ण रिश्ते।