जफ़ा परस्त इंसान है वो,
उसके साथ रहकर भी किसी और का है वो
उसके बाद भी किसी और का है वो
ज़मीर बांकी नहीं है अब उसका कितना बेगैरत इंसान है वो
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जब ज़मीर ही मर जाए,
तो इंसान सिर्फ जिस्म रह जाता है
और वो जिस्म की चाह में है वफ़ा की उम्मीद उनसे मत रखो जिनका ईमान बिक जाता है