आज़ादी
ऐसे ही नहीं जली मशाल ए आज़ादी।
कितने ही वीरों के बलिदानों ने इसे हवा दी।
तलवारें लड़ी सन् सत्तावन में।
राजा रानी बादशाह बेगम सब कूद पड़े रण में।
सत्तावन के बाद चाटुकारों को छोड़कर सबने अपने राज्य खोए थे।
नील अफीम की खेती से खेत खलिहान रोए थे।
फिर आया वो वक्त जब बच्चे - बच्चे में देशप्रेम जाग गया।
सोचा अब तो फिरंगी भाग गया।
लाल बाल पाल के विचारों से प्रेरित होकर युवाओं में फैली आग।
उधर नरम दल ने अलापा अहिंसा का राग।
लाला जी ने खाई लाठियां जलियांवाला बाग में निर्मम हत्याएं हुई।
फिर भी क्रांतिकारी न हटे पीछे तेज क्रांति की लपटें हुई।
अल्फ्रेड पार्क में आज़ाद जी ने स्वयं को गौरवान्वित गोली मारी थी।
नेता जी के नारे से गूंजी गलियां सारी थी।
भगत सुखदेव राजगुरु २३-२४ की उम्र में फांसी पर झूल गए।
सावरकर जी पर अत्याचारों को हम कैसे भूल गए।
आज़ादी सिर्फ एक के बल पर आई नहीं।
कुछ लोगों को अनावश्यक बड़ा दिखाने की बात ‘शान' को भाई नहीं।
लाठियां खाई काला पानी सहा पर डटे वहीं।
खून से लिखी इबारत पर मिटे नहीं।
आखिरकार १९४७ मे तीन रंग की ध्वजा ‘शान' से लहराई।
पर याद रखो ये आज़ादी मुफ्त में ना पाई।
सृष्टि तिवाड़ी शान
- srishti tiwari