Hindi Quote in Poem by Digvijay Singh Rathore

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यत्र तत्र सर्वत्र

गर्म हवा मुल्क को लील रही,
नवीन सोच को झुलसा रही।
कई दूरियाँ पट रही, उभर रही,
मानवता दिन-दिन तिल हो रही।

झगड़ों का अंबार है, झंडों की गुलामी,
एक नई नफ़रत लहू में उबाल मार रही।
अनगिनत मंदिर हैं, अनगिनत मस्जिद,
प्रेम सिकुड़ रहा, झूठा राष्ट्रवाद उफ़न रहा।

कागज़ पर सब चंगा दिखता, मीठी स्याही,
ग़ौर से सूंघने पर स्याही रक्त सी तप रही।
फ़िज़ा का धर्म नहीं कोई, न कोई सरहदें,
क्यों ख़ुद को हम क़ैद में घुटते जा रहे हैं।

आतंक के बलबूते बेगुनाहों को सताते,
मज़लूमों को रगड़ते, अपने लफ़्ज़ बुलवाते।
जेबें सरेआम काटी जाती, क़ानून में फँसाते,
भावनाएँ आहत होतीं, बस्ती जलाई जाती।

आलम है न्याय का मेरे महबूब सा रिश्ता,
आज ग़लत, कल का सही, परसों कोई नया।
मरे हुओं को मौत आ जाती दुबारा हुज़ूर मेरे,
आते-आते आदेश, आधा इंसान बनता मूर्ति मेरे।

दो मुल्कों के नासूर रोग से पीड़ित है सब यहाँ,
कभी फटे बम यहाँ, कभी फटे मिसाइलें वहाँ।
बच्चे मरते कूड़ा बीनते, घुट-घुट अदना मरता,
मरती शबनम, मरती मीरा, प्रेम हृदय दफ़नाता।

पूर्वज ताड़ पे लिखते, उंगलियों से रटते जाते,
कल भी क़लम बेबस, वर्तमान दोहराता दिखता।

Hindi Poem by Digvijay Singh Rathore : 112033273
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