और कभी ना लोटु
कविता
रोते हुए को
रोने के लिए अपना कंधा दिया नहीं
और मरने के बाद बात पर
मेरे अपने कहते हैं
तुम्हारा कौन है
हमारे अलावा
हम ही हैं जो तुम्हें तुम्हारे मरने के बाद कंधा देंगे
कभी-कभी हंसी आती है
मुझे इसबात पर
क्या सीरियसली
जब मैं साथ चाहती हूं
अपनों की तो वह मेरे साथ नहीं होतें
जब मैं चाहती हूं कि मैं रो रही हूं
और मुझे कंधा मिले अपनों की तो
वो अहंकार और नफरत में
अपने सर ऊंचा रखता है
जब मैं चाहती हूं मुझे प्यार मिले अपनों की तो
वो ऐ कहे कर दुतकार देता है
कि मैं इस लायकनहीं हूं
मरने के बाद मैं उसके आंसू को क्या करूं
मरने के बाद मैं उसके पछतावे की क्या करूं
मरने के बाद मैं उसे कंधे का क्या करूं
जो मुझे दिया जाएगा
मरने के बाद मेरे लिए रखी गई 13वीं का क्या करूं
मैं चाहूंगी जब मैं यहां मारूं तो
मेरे लिए कोई रोए ना
मुझे कोई कंधा नहीं दे
बस ले जाकर ऐसे ही दफना दे
कोई अंतिम संस्कार की विधि ना हो
कोई अंतिम विदाई नहीं
मेरे लिए कोई तेरहवीं भोज ना करें
जीते जी मैं उनके लिए कोई मान्य नहीं राखी
तो
मरने के बाद कोई दिखावा न करें
और सच तो यह है
मैं चाहूंगी मेरी आखिरी सांस में मैं यहां बिल्कुल ना रहु
एक ऐसे शांत जगह चली जाओ
जहां से मेरे शव तो क्या
चिखे भी वापस न लौटे
मैं चाहूंगी मैं आनंद सागर में समा जाऊं
और कभी ना लौटु
मरने के बाद
मेरे जिस्म की एक टुकड़ा भी नहीं
किसी को कभी मिले
और मैं नहीं चाहूंगी मेरे लिए कोई पूजा पाठ कर
मेरी आत्मा की शांति के लिए
कोई तेरीहवीं रखी जाए
अगर अंतिम संस्कार की पूजा रखना जरूरी है
आत्मा की शांति के लिए
तो
मैं चाहूंगी मैं उसे हाल में रहूं
की जीते जी मैं
अपनी अंतिम संस्कार की विधि खुद कर लु
किसी और पर अपनी मौत की अपनी शव की
भाड़ डालने से अच्छा है
मैं खुद की पिंडदान खुद कर लूं
मैं नहीं चाहती कि ऐसे लोग मेरे शव को भी छुए
जिसके पास रहकर
मुझे जीते जी प्यार और अपनापन महसूस ना है
सच यह है
मैं आंखों में सितारा भर के मरना चाहती हूं
बिना पछतावे की
गमों को गले लगा कर मारना चाहती हूं
मैं नहीं चाहती कि मरने के वक्त मुझे कोई दुख हो
इसलिए मैं चाहती हूं
ऐसे लोगों से जिससे मेरी कोई परवाह ही नहीं
मैं मौत के वक्त दूर ही रहना