देख कर आँखों में मेरी,
संवरते हैं वो अक्सर...
एक अक्स सा रह जाता है इनमें, उनके चले जाने के बाद...
और बाख़ुदा ये जानते हैं हम, अमानत किसी गैर की हो... अपनी सी क्यों लगती हो तुम, यूँ करीब आने के बाद...
दुश्वारियाँ बहुत हैं मिलने में, और फासले ज़मानों के... तमन्नाएँ बेकाबू परिंदों सी, पर हौसले हैं परवानों के...
इंतज़ार यूँ उसके मिलने का, एक मीठी सी सज़ा देता है... और इश्क-इश्क ज़रा नाजायज़ हो, तो कुछ अलग ही मज़ा देता है...