तुमको आते नज़र, हम मगर सितमगर,
तुमने आंगन के परदे उठाए नहीं।
हमपे नाराज़गी, इतनी तारी रही,
बैठ कर पहलू में मुस्कुराए नहीं।
तुमको आते नज़र, हम मगर सितमगर,
तुमने आंगन के परदे उठाए नहीं।
नींद आई नहीं, हमको कल रात को,
क्या कहे,कैसे समझाया, जज़्बात को,
मेरे शिकवों पर तुम रूठ ऐसे गए,
आज सुबह भी खिड़की पे आए नहीं।
तुमको आते नज़र, हम मगर सितमगर,
तुमने आंगन के परदे उठाए नहीं।
आज छत सामने वाली खाली दिखी,
थोड़ा गुमसुम सी वो नखरे वाली दिखी,
जब से देख तेरा, गमजदा चेहरा,
या खुदा आज तक भूल पाए नहीं।
तुमको आते नज़र, हम मगर सितमगर,
तुमने आंगन के परदे उठाए नहीं।
तू दुआ दे, दवा दे, जहर आज दे,
हैं क़ुबूल मुझे, तू बस आवाज दे,
साथ हैं चाहते उम्र भर का तेरा,
आके मंजिल पे तू छोड़ जाए नहीं।
तुमको आते नज़र, हम मगर सितमगर,
तुमने आंगन के परदे उठाए नहीं।
प्रिया अरविंद।