बुद्धि भ्रष्ट
माधव की बुआ के समय बीता हुआ शिशु हुआ।
सब खुशियां मनाए रहे पर जब देखा पहली बार शिशु को सब संकोच उठाए रहे।
चार भुजा तीन नेत्र देखकर सब घबराए रहे।
माता-पिता चले त्यागने शिशु को दूर कर रहे।
हुई आकाशवाणी जब फिर परमात्मा समझाए रहे।
मत त्यागो पुत्र को जिसकी गोद में खेल के यह ठीक होगा।
वही पुत्र का अंत करेगा।
अब बारी माधव की थी।
लेत गोद में जब शिशु को झड़ गए सभी अंग बन गया सामान्य शिशु को देखकर खुशी बना रहे।
याद आई बुआ को बात फिर क्या था?
मांगने लगी माधव से वचन तुम 100 गलती भी क्षमा करो।
वचन दो माधव मुझको दिया वचन माधव ने मैं 100 गलती क्षमा करूं।
101 गलती पर अंत करूं।
सुन वचन बुआ माधव के अब कुछ संतुष्टि पाई शिशु बड़ा होने लगा।
नाम शिशुपाल कहलाने लगा।
माधव को बैरी मान रहा।
अब उनकी निंदा कर रहा।
यज्ञ कराया पांडव ने सबको न्योता आया।
भारी भरी सभा में माधव को उत्तम पुरुष माना।
यही नहीं सह पाया निंदक फिर क्या होना था?
लगा बोलने माधव को छलिया ग्वाला अनगिनत नाम लगे माधव करने गिनती अब हुई 99 गलती।
फिर माधव ने सोच चेत किया।
आखिरी गाली मत करना।
फिर उसको समझाया है पुत्र मेरी बुआ का गलत लगता मेरा भाई है।
मान जा गलती मत करना।
यही सीख समझाई है।
जब अकल पर पत्थर पड़ जाएं कुछ नजर नहीं आता है।
आखिर उसने फिर माधव का अपमान किया।
लिया सुदर्शन चक्र बुलाए फिर उसका अंत किया।