शरीर नहीं दिल थक चुका है,
आसूं नहीं आंख थक चुकी है।
पर नाउम्मीद का घर जो दिल
में बस गया है, उम्मीद एक कोने
में छुपी बैठी है, कि मेरा भी वक्त
आएगा लेकिन शायद उसे नहीं
पता कि वक्त ने दुख के साथ
हाथ मिलाया है और सुख को
बस कुछ लम्हे ही दिए हैं ।
- Fictional world