“मैं देखना चाहती हूँ… “
मैं देखना चाहती हूँ…
तुम्हारी मुस्कान के बाद तुम्हारी पलकों का धीरे से झुक जाना,
जैसे किसी ने चाँद को शर्माना सिखा दिया हो।
मैं देखना चाहती हूँ…
तुम्हारी आँखों को बिना कुछ कहे मुझसे घंटों बातें करते हुए,
कि शब्दों की उम्र छोटी होती है, नज़रों की नहीं।
मैं देखना चाहती हूँ…
तुम्हारे माथे पर उभरती वे मासूम-सी लकीरें,
जो हर बार तुम्हारे कुछ सोचने पर और भी ख़ूबसूरत हो जाती हैं।
मैं देखना चाहती हूँ…
तुम्हारी उँगलियों को मेरे बालों में उलझते हुए,
जैसे कोई पुरानी किताब बरसों बाद फिर से खोली गई हो।
मैं देखना चाहती हूँ…
तुम्हारा मेरा नाम लेना, उस तरह…
जैसे पुराने ज़माने में लोग मोहब्बत नहीं, इबादत पुकारा करते थे।
मैं देखना चाहती हूँ…
तुम्हें चलते हुए, ज़रा-सा धीरे, ज़रा-सा ठहरकर,
ताकि रास्ते भी समझ सकें कि साथ किसे कहते हैं।
मैं देखना चाहती हूँ…
तुम्हें मुझे देखते हुए, बिना किसी वजह, बिना किसी सवाल,
सिर्फ़ यूँ… जैसे कोई अपनी सबसे प्यारी चीज़ को यक़ीन से देखता है।
मैं देखना चाहती हूँ…
तुम्हारी हँसी के बाद तुम्हारी ख़ामोशी,
क्योंकि मुझे लगता है, तुम्हारी चुप्पी भी मुझसे मोहब्बत करती होगी।
मैं देखना चाहती हूँ…
तुम्हारे हाथों की लकीरों में अपना कल नहीं, अपना सुकून।
क्योंकि उम्र तो सबके साथ बीत जाती है, ज़िंदगी बहुत कम लोगों के साथ।
मैं देखना चाहती हूँ…
कि किसी दिन जब मैं आईने के सामने खड़ी रहूँ,
तो मेरे चेहरे से पहले तुम्हारी नज़र मेरी थकान पढ़ ले।
मैं देखना चाहती हूँ…
तुम्हें उसी तरह, जैसे पुराने ज़माने की मोहब्बतें देखती थीं।
कम कहा जाता था, ज़्यादा निभाया जाता था।
और आख़िर में…
मैं देखना चाहती हूँ…
कि एक दिन जब मेरी उम्र मेरे बालों में उतर आए,
तब भी तुम मुझे उसी पहली मुस्कान की तरह देखो,
जिस दिन हम पहली बार मिले थे।
प्राची गुर्जर…..