“क्या हो अगर… “
क्या हो अगर…
किसी रोज़ तुम फिर से मिल जाओ,
और मेरी आँखें तुम्हें पहचान लें,
मगर मेरा दिल तुम्हें अपना कहने से इंकार कर दे।
क्या हो अगर…
तुम बिल्कुल सामने खड़े हो,
और हमारे बीच बस एक साँस भर की दूरी हो,
फिर भी सालों जितनी ख़ामोशी खड़ी रहे।
क्या हो अगर…
मैं तुम्हारा नाम पुकारना चाहूँ,
और आवाज़ गले तक आकर हर बार लौट जाए।
क्या हो अगर…
तुम मुस्कुरा दो, वैसे ही जैसे कभी मुस्कुराया करते थे,
और मैं उस मुस्कान के पीछे छिपा हर झूठ देख लूँ।
क्या हो अगर…
तुम कहो, “मैंने कभी तुम्हें दुख देना नहीं चाहा।”
और मेरा दिल धीरे से पूछ बैठे, “फिर ये ज़ख़्म इतने पुराने कैसे हैं?”
क्या हो अगर…
तुम्हारी आँखें आज भी वैसी ही हों,
मगर उनमें मेरे लिए एक पल भी न ठहरा हो।
क्या हो अगर…
मैं तुम्हारे बिल्कुल पास बैठी रहूँ,
और पहली बार समझूँ, फ़ासले मीलों से नहीं, बदलते दिलों से बनते हैं।
क्या हो अगर…
तुम्हारे सारे सच बहुत देर से सामने आएँ,
और मैं सोचती रह जाऊँ, मैंने उम्र किस बात पर यक़ीन करके गुज़ार दी।
क्या हो अगर…
जिसे मैं मोहब्बत समझती रही,
वह तुम्हारे लिए बस एक गुज़रता हुआ मौसम था।
क्या हो अगर…
तुम्हारे जाने का दुख तुम्हारे झूठ से छोटा निकले।
क्योंकि बिछड़ने से ज़्यादा यक़ीन का मर जाना इंसान को तोड़ देता है।
क्या हो अगर…
तुम लौट भी आओ, और मैं तुम्हें माफ़ भी कर दूँ।
लेकिन… मेरे भीतर तुम्हारे लिए वही जगह कभी लौटकर न आए।
क्या हो अगर…
कुछ रिश्ते मरते नहीं,
बस… ज़िंदा रहने का अभिनय करते रहते हैं।
और हम हर रोज़ उनकी साँसें सुनते रहते हैं।
क्या हो अगर…
तुम सचमुच एक दिन लौट आओ।
और मैं… पहली बार तुम्हें पाने की नहीं,
तुमसे बच जाने की दुआ माँगूँ।
प्राची गुर्जर