અજાણ્યો પત્ર - 32
सोच रहा हूं आज झूठ लिख दूं। झूठ लिखूं कि तुम्हारी सुबह की चाय की पहली घूँट मेरे ख़यालों के साथ उतरती है। लिखूं झूठ की जब-जब तुम खुद को सँवारती हो, तो सिर्फ़ मेरी तारीफ़ सुनने की चाह में सँवारती हो। लिखूं झूठ की जब जब दिल भर जाता है तुम्हारा तब तब अपनी बाहों में तुम सिर्फ मुझे पाना चाहती हो और लिखूं एक आखरी झूठ की तुम आज भी सिर्फ मुझसे बेइंतहां महोब्बत कर रही हो।