मेरा बयान लिख लीजिए साहब,
मैंने सच बोलने की कोशिश की थी...
फ़िक्र मत कीजिए हुजूर, गवाह अब कोई ज़िंदा नहीं।
ये और बात कि दरिया दिखाई देता था, तमाम प्यास का रिश्ता तो एक कुएँ से था।.....
फ़लक ने और बुलंदी अता की उसके बाद, जहाँ से गिरने में बाकी कोई कसर न रही....
फ़िक्र की कोई बात नहीं है, भूख अब आदत में आ गई है।
बड़ी अजीब है रिश्तों की आख़िरी मंज़िल, बिछड़ भी जाओ तो इल्ज़ाम साथ चलता है।......
बात इतनी थी कि तुम लौट के आ सकते थे, अब ये कहना कि ज़रूरी था, ज़रूरी भी नहीं।......
उसे यक़ीन था, दीवार गिर नहीं सकती, दरार चुप थी, मगर अपना काम करती रही......
सब सबूतों को आग दे दी है, अब मुक़दमा बहुत मज़बूत है।.......
हर वफ़ादारी का मतलब सम्मान नहीं होता, न जाने क्यों... ये इल्म जिंदगी में देर से आता है।