मैं और मेरे अह्सास
अनसुनी कहानी
अनसुनी कहानी को अनसुनी ही रहने दो l
उसके पीछे छीपा दर्द अनसुना सहने दो ll
मुँह ने तो मौन व्रत धारण कर ही लिया है l
निगाहों को जो कहना खुलकर कहने दो ll
किसी को कोई फर्क नहीं पड़ता है कहानी से l
ज़माने को दिखाने खुशी का चौला पहने दो ll
"सखी"
डो. दर्शिता बाबूभाई शाह