मेरे दोस्त…..
कितने दोस्त हैं तुम्हारे?
हाँ दोस्त... दोस्ती सबको पसंद है...
मुझे भी है।
पर मेरी दोस्ती मतलबी लोगों से नहीं।
मेरी दोस्ती है अंधेरों से
जो मुझे उजालों तक ले जाने के क़ाबिल बना रहे हैं।
जो गिराते हैं, ताकि उठना सिखा सकें।
जो डराते हैं, ताकि हिम्मत पहचान सकूँ।
मुझे बैठना पसंद है अपनी ख़ामोशी के साथ
वो मेरी पक्की सहेली है।
क्योंकि वो शोर नहीं करती, सिर्फ़ सुनती है...
मेरे एहसास, मेरे आँसू, मेरी वो बातें
जो लफ़्ज़ों से कहने लायक़ नहीं।
वो डाँटती नहीं, बस समझती है।
मैं रोज़ अपने ख़ास दोस्त 'अकेलेपन' के साथ बैठकर खाना खाती हूँ।
वो हर निवाले पर मुझे रिश्तों की अहमियत समझाता है।
बताता है कि भीड़ में भी इंसान कितना तन्हा हो सकता है,
और तन्हाई में भी कोई कैसे तुम्हारा अपना बन जाता है।
मेरे दोस्तों का कोई रूप नहीं, कोई रंग नहीं...
अदृश्य हैं वो सब।
पर रहते हैं मेरे अंदर, मेरी साँसों में, मेरी रग-रग में।
हर क़दम पर मुझे संभालते हैं,
जब दुनिया धक्का देती है, तो यही मुझे थाम लेते हैं।
लोग पूछते हैं, "तुम अकेली क्यों रहती हो?"
मैं हँस कर कहती हूँ, "अकेली कहाँ... मेरे साथ मेरी पूरी महफ़िल है।"
मेरा दर्द मेरा दोस्त है…..जो मुझे मज़बूत बनाता है।
मेरी रातें मेरी दोस्त हैं …..जो मुझे सपने बुनना सिखाती हैं।
मेरा सब्र मेरा दोस्त है …..जो मुझे टूट कर बिखरने नहीं देता।
और हाँ,
जब सब छोड़ जाएँ,
तो यही अदृश्य दोस्त कंधे पर हाथ रख कर कहते हैं….
"चल... अभी सफ़र बाक़ी है। हम हैं ना तेरे साथ।"
तो मेरी दोस्ती आम नहीं...
वो ख़ास है, बेमिसाल है।
क्योंकि मेरे दोस्त दिखते नहीं,
पर ज़िंदगी के हर मोड़ पर मिल जाते हैं।
प्राची गुर्जर …..