असहज द्वंद्व✨
तुम्हें मैं क्या समझूँ?
तुम्हें समाज ने सताया या तुमने समाज को?
मैं डर जाता हूँ, जब तुम मुझे देखते हो।
तुमने अपने चरित्र को ऐसा विचित्र बनाया,
जिससे केवल विचलितता जन्म लेती है।
तुम्हारे अजीब वस्त्र, गले में अनेकों मालाएं,
शरीर पर राख, सिर पर टोपी और चश्मा,
गले में लटकती सीटी—जब तुम चलते हो,
तो सच यह है कि 'स्वस्थ मनुष्य' की परिभाषा,
तुमसे कहीं मेल नहीं खाती।
तुम कहीं भी मल त्याग करते हो, कहीं भी गंदगी,
कहीं भी सो जाते हो; स्वच्छता से तुम दूर भागते हो।
गालियाँ तुम्हारे मुख से धारा-प्रवाह फूटती हैं—
कभी भी, किसी के लिए भी!
तुम्हारी प्रजाति कम नहीं है, समय के साथ बढ़े हो तुम भी।
कभी खुद को 'बाबा' कहते हो, कभी 'पागल',
कभी कहते हो—"मैं दुनिया से परे हूँ,"
पर कभी शराब, तो कभी नाली में पड़े हो!
तुम्हारे विचित्र चरित्र से जन्मी क्रियाएँ,
मुझे गहरे तक असहज कर देती हैं।
मैं स्वयं से प्रश्न करता हूँ कि—
इस असहजता का जिम्मेदार आखिर कौन है?
समाज, तुम, या मैं खुद?
जो भी हो, मैं तुमसे सहजता की दोस्ती नहीं कर पाता।
तुम मुझे ऐसे मत देखो... मैं जा रहा हूँ;
तुम्हें तुम्हारी ही स्थिति में छोड़कर।
मैं कामना कर सकता हूँ—तुम्हारे स्वस्थ होने की,
या...
स्वयं को तुम्हें समझने के लायक बनाने की।
तुम स्वस्थ रहो!
अलविदा।
~ कपिल तिवारी "यथार्थ"