गीत: कहाँ गए वो पेड़*
*रचनाकार: डॉ वंदना शर्मा*
कहाँ गए वो पेड़, वो बगिया,
कहाँ गए वो फूल और कलियाँ,
मेरा सुकून कहीं खो गया,
मेरा पर्यावरण कहीं खो गया।
कैसा शहर है ये,
जिधर भी देखूँ नज़र दौड़ाऊँ,
इमारतें ऊँची-ऊँची, तंग गलियाँ,
हर जगह भीड़, धुआँ-धुआँ।
कहाँ गया वो खुला नीला आसमां,
वो चिड़िया अब नहीं आती,
वो बरसात अब नहीं आती,
प्रकृति जो सजाए हरी-भरी धरती।
असली सुकून वही है -
वो नदियाँ, वो बाग़,
वो चिड़िया, वो कलियाँ।
मत करो वीरान धरती को पेड़ों से,
एक पौधा लगाओ जड़ो जड़ो से।
सुनो ज़रा पक्षी भी करते हैं बातें,
नदियाँ गुनगुनाती चलें लहलहाते।
क्या पाया इस भीड़ ने?
सुकून खोकर उगायी इमारतें,
फिर सुकून ढूँढने पहाड़ों पे जाते।
*आओ सजाएँ अपनी धरती,*
*जीवन बचाएगी यह प्रकृति।*
*आने वाली पीढ़ी को उपहार ये देना,*
*यही है सबसे सुंदर अनमोल कृति।*
*डॉ वंदना शर्मा*
पांडव नगर new delhi
*3/6/25*