*मैं वंदना हूँ*
_एक औरत, एक एहसास_
मैं वंदना हूँ,
सिर्फ नाम नहीं, एक प्रार्थना हूँ
घर के हर कोने में बसती,
रिश्तों की अनकही भावना हूँ
सुबह चूल्हे से शुरू होती हूँ,
रात किताबों में खत्म होती हूँ
दिन भर सबकी फिक्र करती हूँ,
आधी रात को खुद को लिखती हूँ
मैं माँ हूँ तो ममता बाँटती हूँ,
बहन हूँ तो हक़ से डाँटती हूँ
बेटी हूँ तो फर्ज निभाती हूँ,
पत्नी हूँ तो घर सजाती हूँ
पर इन सबके बीच कहीं,
एक "मैं" भी छुपी बैठी है
जो कविता में साँस लेती है,
शब्दों से दुनिया बुनती है
"खाने में क्या बनेगा" से लेकर,
"मोर के पंखों" के दर्द तक
मैंने हर आँसू को स्याही बनाया,
हर मुस्कान को कागज़ पर टाँक
थकती हूँ, टूटती हूँ, फिर जुड़ती हूँ
कभी चुप, कभी दुनिया से लड़ती हूँ
पर हार मानना सीखा ही नहीं,
क्योंकि मैं वंदना हूँ -
*_वंदना मतलब अभिवादन,
और मेरा जीवन ही सबसे बड़ा अभिनंदन है__
अपनों के लिए जीती हूँ,
अपनों में ही खिलती हूँ
ना मंदिर, ना मस्जिद चाहिए,
बस अपनों की खुशी में मिलती हूँ
__तो सुनो दुनिया वालो,
मैं कमजोर नहीं, कोमल हूँ
मैं बोझ नहीं, आधार हूँ
मैं सवाल नहीं, जवाब हूँ
मैं वंदना हूँ - और मुझे खुद पर नाज़ है_