सेवा संस्कार है या गुलामी? दोहरा मापदंड क्यों?
हमारे समाज की विडंबना देखिए!
जब एक बहू अपने सास-ससुर की सेवा करती है, तो उसे 'संस्कारी' और 'आदर्श बहू' का दर्जा दिया जाता है। लेकिन जब वही बेटा अपने बूढ़े माता-पिता या सास-ससुर की सेवा करता है, तो समाज उसे 'जोरू का गुलाम' कहने में एक पल भी नहीं लगाता।
आखिर सेवा करने का पैमाना लिंग के आधार पर क्यों तय किया जाता है?
इंसानियत और फर्ज निभाना तो दोनों का ही कर्तव्य है। अगर बेटा अपने माता-पिता की देखभाल करे, तो वह 'गुलाम' नहीं, बल्कि 'जिम्मेदार' है। समाज को अपनी इस पुरानी और संकीर्ण सोच को बदलने की ज़रूरत है। सेवा कोई मजबूरी नहीं, बल्कि एक प्यार भरा फर्ज है, फिर चाहे वो बेटा निभाए या बहू।
क्या आप भी इस बात से सहमत हैं कि 'सेवा' को 'गुलामी' का नाम देना बंद होना चाहिए? अपने विचार कमेंट्स में साझा करें।
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