प्रचण्ड प्रभाकर ज्वाला बरसाए,
धरा दग्ध हो व्यथा सुनाए।
तप्त पवन के तीक्ष्ण प्रहारों से,
व्याकुल हो उठता संसारा।
दिग्दिगंत दहके दावानल-सा,
छाया भी शरण न दे पाती,
स्वेद-बिंदुओं की सरिता बहती,
निद्रा पलकों से डर जाती।
तभी किसी प्रतिभा-पुरुष ने,
शीतल यंत्र-विज्ञान रचाया,
अहंकारी आदित्य के सम्मुख,
हिम-स्पर्शी साम्राज्य बसाया।
अब सूर्य सहस्र किरणें फेंके,
गृह के भीतर शिशिर समाया,
जिसने वातानुकूलन गढ़ डाला,
उसने सचमुच सूर्य हराया।
उषा जरवाल ‘ एक उन्मुक्त पंछी’