## **मैं तुम्हें फिर मिलूँगा**
**(इमरोज़ संस्करण)**
*-मनप्रीत मेहनाज़*
मैं तुम्हें फिर मिलूँगा
कहाँ? किस तरह? पता नहीं
शायद तेरा दर्द बन कर
तेरी कविता में उतरूँगा,
या काव्य-बोल की टुणकार ही बन जाऊँ,
तेरी लय के साथ लय मिला लूँ।
शायद तेरी किसी कहानी का पात्र बनकर
तेरी सृजित कथा-भूमि में बनता-बिगड़ता रहूँ।
फिर तेरी कलम का स्पर्श मुझे मुकम्मल कर दे
या अधूरा छोड़ दे
पता नहीं किस तरह, कहाँ
पर तुम्हें ज़रूर मिलूँगा।
शायद हाथों में पकड़ी किताब बन जाऊँ
तू खोले, पढ़े, चूमे
और अपने सीने से लगा कर रखे,
कहीं-कहीं कुछ निशान भी लगाए,
हो सकता है तू बार-बार पढ़े
या आधे में ही छोड़ दे
पर मैं तुम्हें ज़रूर मिलूँगा।
ज़िन्दगी को भरपूर जीने के लिए
एक-दूसरे का हाथ पकड़ कर
लम्बे रास्तों पर चलने के लिए
अँधेरी रातें बिताने के लिए,
सितारों को गिनने के लिए
मैं तुम्हें फिर मिलूँगा।
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