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उठते सागर
विजय शर्मा एरी
उठते सागर,
गरम होती धरती,
भीषण तूफ़ान,
चेतावनी स्पष्ट दी…
रोते हिमखंड,
उनकी चुप्पी गूँजती,
पिघलते आँसू,
लहरों में बदलती।
जलते वन,
आकाश धुँधला,
प्रकृति का गीत
अब शोक में ढला।
नदियाँ घुटतीं,
सूखी ज़मीन,
पक्षी उड़ते,
पर ठिकाना कहीं नहीं।
काँपते नगर,
सागर किनारे हटते,
मानव का अहंकार
अब हार चखते।
बच्चों की आँखें
मुरझाए प्रभात पर,
हरियाली के सपने
खो गए रात भर।
फिर भी आशा
साँसों में पलती,
परिवर्तन के बीज
धरती में खिलती।
साथ मिलकर उठें,
साथ मिलकर खड़े हों,
धरती को सँवारें,
उसके घाव भरे हों।
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यह हिंदी कविता अंग्रेज़ी मूल की भावनाओं को उसी गहराई और चेतावनी के स्वर में प्रस्तुत करती है, साथ ही अंत में आशा और सामूहिक प्रयास का संदेश देती है।