तुम्हारी आँख
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उस युग में,
जहाँ सब कुछ लिखा जा चुका,
सब कुछ कहा जा चुका,
और लगभग-लगभग
सब कुछ खोजा जा चुका है,
उस युग में
मुझे कुछ भी नहीं होना,
तुम्हारी एक आँख से इतर।
ताकि देख सकूँ
वे नाम
जो अभिलेखों तक कभी पहुँचे ही नहीं,
वे चेहरे
जो इतिहास में नहीं,
वे स्त्रियाँ
जो लौटीं,
वे जंगल
जो काट दिए गए,
और वो प्रेम
जो जिए गए।
मुझे सब देखना है
ताकि दर्ज हो सके
तथाकथित कवियों की,
तथाकथित इतिहासकारों की,
तथाकथित खोजकर्ताओं की
सबसे पुरानी और सबसे सफल
असफलता।
@ कुणाल कुमार