कई बार यह अनुभव हुआ है—
कि जीवन में घटनाएँ
हमारी इच्छा से नहीं,
एक अदृश्य विधान से घटित होती हैं।
जब और जहाँ उनका होना लिखा है,
वे वहीं घटित होती हैं—
न एक क्षण पहले,
न एक क्षण बाद।
हम कितनी भी प्रतिज्ञाएँ कर लें,
कितने भी प्रयासों की परतें बुन लें,
पर फल तभी प्रकट होता है
जब समय परिपक्व होता है।
तब समझ आता है—
हम केवल निमित्त हैं,
कर्त्ता तो कोई और ही है…
जिसके हिस्से में जो अनुभव है,
वह उसे प्राप्त होकर ही रहता है—
चाहे वह अवहेलना का स्पर्श हो
या प्रसिद्धि का प्रकाश।
और तब मन धीरे से कह उठता है—
जो भी हो सब स्वीकार है...
Life is a wonderful journey!
Enjoy it...