Hindi Quote in Poem by Sudhir Srivastava

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सरसी छंद (१६,११) गीतिका
आम आदमी सोच रहा है
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आया कैसा नया जमाना, देख-देखकर दंग।
कैसा हुआ आज का प्राणी, पल-पल बदले रंग।।

आम आदमी सोच रहा है, कैसे हो उद्धार।
माया बंधन झूल रहा है, चाहे प्रभु दें तार।।
ध्यान नहीं ईश्वर का करता, लालच है भरपूर।
अपनों से भी थोड़ा रिश्ता, प्रेम भाव से दूर।।

समय चक्र का खेल निराला, भला समझता कौन।
रहना चाहे आज न कोई, कभी कहाँ खुद मौन।।
कुंठा से पीड़ित है प्राणी , तजे नहीं अभिमान।
अपने को वह मान रहा है, जग में बड़ा महान।।

अच्छा नहीं सोच पाता है, चलता टेढ़ी चाल।
लीक छोडकर खुद जाता है, भले झुके निज भाल।। मर्यादा को भाव न देता, माने खुद को श्रेष्ठ।
छोटे बड़े सभी के आगे, कहता मैं ही ज्येष्ठ।।

नाहक उलझा मानव जग में, दोनों हाथ पसार।
प्रतिस्पर्धा की इस दुनिया में, लेता चढ़ा उधार।।
और सोचता है रहता वो, मेरा बेड़ा पार।
दौलत का दिमाग में कीड़ा, समझे जीवन सार।।

सुधीर श्रीवास्तव

Hindi Poem by Sudhir Srivastava : 112023569
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