“वक़्त और हम"
जिसे समझना था उसे कभी हम समझ न पाए,
साँसे तो चलती रही पर एक पल हम जी न पाए।
वक़्त के धागों में उलझ कर रह गई हर बात यहाँ,
दिल तक पहुँचा सच मगर होंठ उसे कह न पाए।
दौर था समझदारी का फिर भी फ़ासले बढ़ते रहे,
हम क़रीब होकर भी रिश्तों से रिश्ते जोड़ न पाए।
हर तरफ़ शब्दों का शोर था मगर यहाँ सन्नाटा रहा,
हमें जो महसूस हुआ वो भी किसी से बता न पाए।
ख़ामोशियों ने भी कई राज़ सीने में दफ़न किए,
हम जो थे अंदर से वह चेहरा कोई देख न पाए।
जिसको समझा था अपना वो भी अपना न हुआ,
हम ही “प्रसंग” थे जो खुद को भी समझ न पाए।
प्रसंग
प्रणयराज रणवीर