मेरी कविता …✍️
सागर की शार्क
तुम ठहरे मलय की शीतल - सी बयार,
और मैं ज्येष्ठ की दहकती दुपहरी प्रखर।
तुममें समाई समंदर -सी अथाह गहराई,
जिसकी थाह लेने को आतुर मीन ललचाई ।
पर मुझमें है सतर्क शार्क-सी तीक्ष्ण चतुराई
जिसकी पैनी दृष्टि से कोई मीन ठहर न पाई।
ज्यों मधु-कलश पर मंडराती भौरों की पंक्ति,
रस-लोभ में करती बारंबार निष्फल प्रयास ।
पर मैं कमल-पत्र की तीक्ष्ण धार समान,
एक स्पर्श में ही रोक दूँ उनका विलास।
ज्यों दीपक की लौ पर आकृष्ट पतंगों का दल,
प्रभा को पाने को करता उन्मत्त विस्तार ।
पर मैं उसकी प्रहरी-वज्र-सी अडिग खड़ी,
जला दूँ उनके साहस का समस्त अहंकार।
ज्यों गुड़ की डली पर चींटियों की लंबी कतार,
मिठास के मोह में उमड़ती जाती है बारंबार ।
पर मैं नागिन-सी बनकर फुफकार उठूँ,
और छिन्न कर दूँ उनका सारा विस्तार।
तो सुन लो हे मीनों की उत्सुक टोली,
इस सागर पर है बस मेरा ही अधिकार ।
जो रहती हो आतुर यहाँ करने को विहार,
यह क्षेत्र है मेरी चौकस पहरेदारी का द्वार।
मुस्कुराकर मैं बस इतना कह दूँ—
लहरों का आकर्षण चाहे जितना लुभाए,
पर शार्क की एक झलक भर से
हर मीन दिशा बदलना ही भाए।
उषा जरवाल ‘एक उन्मुक्त पंछी’