भावनाओं का एक मेघ था मैं…....
"कभी-कभी प्रेम केवल समर्पण नहीं, एक गहरा विसर्जन होता है। जहाँ एक मेघ अपना समूचा आकाश छोड़कर सिर्फ इसलिए बरसता है कि कोई प्यासी कली खिल उठे। पर क्या होता है तब, जब बरसने वाले की पवित्रता, सामने वाले के लिए केवल एक 'बेचैनी' बन जाए? यह कविता उसी अनसुनी बारिश की कहानी है..."
भावनाओं का एक मेघ था मैं…
तेरी सादगी और तेरी ख़ुशबू में इतना खो गया
कि अपना आकाश, अपना अस्तित्व… सब भूल बैठा।
अपने हर धड़कन, हर दर्द, हर खुशी को
नाज़ुक शब्दों की बूँदें बनाकर
बस तेरे ऊपर ही बरसाता रहा—
इस यक़ीन के साथ कि
मेरे प्रेम की बारिश से तू और खिलेगी,
और मेरी बूँदों में अपना प्रतिबिंब ढूँढेगी।
पर क़िस्मत को कब वसंत महसूस हुआ है…
बरसने की चाह तो हर किसी में होती है,
पर भीगने की हिम्मत हर दिल में नहीं।
जब मेने देखा,
तो तू छाते की नीचे छिपी हुई थी—
जैसे बारिश तेरी पीड़ा हो,
और मेरा प्रेम कोई आशीर्वाद नहीं,
एक अनजानी, अनचाही बेचैनी हो।
तभी समझ आया—
भावनाएँ कितनी भी पवित्र हों,
अगर सामने वाला दिल
स्वीकार की एक धड़कन भी ना दे,
तो बूँदें छूती नहीं—
बस फिसलकर बह जाती हैं।
पानी जैसा शुद्ध प्रेम भी
अगर कोई उसे प्यास से न अपनाए,
तो वह जीवन नहीं देता…
सिर्फ़ एक बहाव बनकर रह जाता है।
मैं तो आज भी अपना आकाश छोड़कर
तेरे लिए बरसने को तैयार हूँ…
पर तू—
तूने अपने ऊपर भीगने का
अधिकार तक आने नहीं दिया।
"अंततः, प्रेम का होना ही पर्याप्त नहीं होता, उसे समेटने की पात्रता भी चाहिए। बूँदें तो गिरती रहेंगी, पर जो भीगने का 'अधिकार' ही न दे, उसके लिए समंदर भी बस एक व्यर्थ बहाव है। मेघ आज भी खड़ा है, अपने खालीपन और भरे हुए मन के साथ—सिर्फ एक स्वीकार की धड़कन के इंतज़ार में।"
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