नज़र तो यूँ आए कि कभी दिखाई न दिए,
जैसे साँस रुके पल-भर… और आवाज़ भी न दिए।
वो पास था, मगर एहसास से बाहर ही रहा,
हाथ छुआ, पर दिल को कोई लम्हा न दिए।
हमने चाहत को भी चुपचाप सहेजा दिल में,
डर ये था कहीं ये मोहब्बत सिसकियाँ न दिए।
रात की गोद में रख दी थी थकी हुई यादें,
सुबह आई तो कोई एक भी किस्सा न दिए।
उसकी ख़ामोशी में इतना सा दर्द था छुपा,
कि टूट जाए दिल… पर वो रोने की इजाज़त न दिए।