ख़ामोशी की ताक़त ( ग़ज़ल:-१ )
कवि / शायर :- अभिषेक चतुर्वेदी 'अभि'
शोर-ओ-गुल में कहाँ मिलती है सदा सच्चाई की,
मैंने सीखी है हुकूमत इसी तन्हाई की।
वो जो कहते हैं कि लफ़्ज़ों में है ताक़त सारी,
उनको क्या इल्म कि क्या ज़द है इस दानाई की।
लब कुशा होने से अक्सर ही बिगड़ती है बात,
चुप ने रखी है हमेशा ही भरम गहराई की।
ज़ुल्म सहकर जो न बोले वो बुज़दिली है मग़र,
सब्र की चुप ही इबादत है मसीहाई की।
शोर से टूट के गिर जाते हैं महलों के ग़ुरूर,
ख़ामोशी नींव हुआ करती है परछाई की।
ज़िन्दगी! तूने सिखाया है सलीका 'अभि' को,
गुफ्तगू अब तो ज़रूरत नहीं रहनुमाई की।
जो न समझे वो इबारत ही अधूरी जानो,
चुप ही व्याख्या है मेरे दिल की पज़ीराई की।
तंज की धार से घायल नहीं होता है अभि,
मार है सबसे कड़ी चुप की और रुसवाई की।
बातों-बातों में छलक जाते हैं खाली बर्तन यहॉं
गंभीरता ही निशानी है ज़र्फ़-ओ-इलाही की।
जिसने सन्नाटे के मफ़हूम को समझ लिया,
जीत पक्की है उसी शख़्स की, उसी राही की।
वक़्त बोलेगा गवाही में तुम्हारी 'अभि',
तुम बस आदत न छोड़ना अपनी शकीबाई की।
कवि / शायर :- अभिषेक चतुर्वेदी 'अभि'