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Abhishek Chaturvedi

Abhishek Chaturvedi Matrubharti Verified

@abhi006
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कुछ सुना है.....

जब किसी का पतन नज़दीक होता है तो,
प्रकृति और समय उसे भरपूर मौका देतें हैं
अत्याचार करने का......
और वह भी जी भरकर अत्याचार करता है,
फिर प्रकृति उस समय की प्रतीक्षा करती है
और वही प्रकृति समय के साथ मिलकर
उसका सर्वनाश कर देती है।
- Abhishek Chaturvedi

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लड़खड़ाते कम और दिल की जुबां.....

एक वाक्य बस _ ( मॉं )

बैसाखी की धूप में, अभि सोना झरे खेत,
मेहनत रंग लायी यहाँ, खिल उठे हर चेत।

ढोल नगाड़े गूँजते, यहॉं नाचे गाँव-समाज,
हँसी-खुशी के रंग में, भींगा हर एक आज।

धरती माँ के आँचल में, अन्न भरा अपार,
किसान के मुख पर सजे, संतोषी श्रृंगार।

पसीने की हर एक बूंद, बनती मीठा फल,
मेहनत से ही जग में, मिलता सच्चा बल।

आशा की हर किरण से, जीवन हो उजियार,
बैसाखी का ये पर्व है, खुशियों का त्योहार।

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आदमी कर्मों से बनाता है.....

बस एक बात बताओ तुम.....

अज़ल से बात ये साबित है दोस्तों सुन लो,
न बच सका है कोई आस्तीं के साँपों से।
पराए तीर कहाँ इस क़दर असर करते हैं,
जो ज़ख़्म मिलते हैं अक्सर अपने ख़्वाबों से।

अभिषेक चतुर्वेदी 'अभि'....

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*सत्य का उद्घोष: निर्भय वाणी ( कविता )*
_कवि:- अभिषेक चतुर्वेदी 'अभि_

सत्य कहो, पर डरो नहीं तुम,
यूं कायरता में मरो नहीं तुम।
भीतर की उस दिव्य ज्योति को,
मौन की ओट से छलो नहीं तुम।

सत्य सूर्य है, प्रखर, तपस्वी,
अंधकार विकराल खड़ा है।
झूठ भले ही स्वर्ण जड़ित हो,
अंत में वो जंजाल बड़ा है

जब अंतस में द्वंद्व मचा हो,
यहॉं भय के बादल छाए हों।
जब स्वार्थ की बेड़ियाँ पैरों पे,
अपनी अकड़ भी लाए हों।

तब याद करो उस निज शक्ति को,
जो सत्य मार्ग दिखलाती है।
डर की छोटी दीवारों को,
क्षण भर में ढहलाती है।

सत्य बोलना कठिन तपस्या,
वीरों का यह आभूषण है।
असत्य तो है मलिन वासना,
आत्मा का ये प्रदूषण है।

भय कहता है- 'मौन रहो तुम',
हित अपना पहचानो तुम।
पर आत्मा कहती- 'अटल रहो',
सत्य को ही ईश्वर मानो तुम।

क्या डरना उन तुच्छ शक्ति से,
जो नश्वर और क्षणभंगुर हैं?
सत्य के सम्मुख झुक जाते वे,
जो अहंकारी और क्रूरक हैं।

इतिहास गवाह है उन लोगों का,
जो फाँसी पर भी मुस्काए थे।
सत्य की खातिर हलाहल पीकर,
शिव लोक अमृत्व में आए थे

हरिश्चंद्र की निष्ठा देखो,
प्रहलाद का विश्वास पढ़ो।
सत्य की ऊँची मीनारों पर,
निडर भाव से आज चढ़ो।

वाणी में हो धार सत्य की,
अभि आँखों में हो तेज नया।
सभी डर के साये छँट जाएँगे,
तब होगा अभिषेक नया।
© _कवि:- अभिषेक चतुर्वेदी 'अभि_

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