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जब सब छोड़ देने का मन करे 😔 जब लगे कि मेहनत का कोई मतलब नहीं जब रास्ता लंबा हो और नतीजा दिखे ही नहीं 🚶♂️ तभी समर्पण की असली परीक्षा होती है। समर्पण का मतलब रुक जाना नहीं ❌ समर्पण मतलब — डटे रहना 🧱 बिना शोर किए, बिना शिकायत किए। जो लोग इतिहास बनाते हैं 📖🔥 वो हर रोज़ जीतते नहीं लेकिन हर रोज़ खुद को काम के हवाले कर देते हैं। उन्हें फर्क नहीं पड़ता कि आज ताली मिली या नहीं 👏 क्योंकि वो जानते हैं — जो बीज आज मिट्टी में गुम है 🌱 वही कल पेड़ बनेगा 🌳 समर्पण वो ताकत है 💥 जो तुम्हें थकने नहीं देती भले ही शरीर थक जाए। ये वो आग है 🔥 जो शोर नहीं करती लेकिन बुझती भी नहीं। आज अगर कोई नहीं देख रहा 👀 तो भी ईमानदारी से मेहनत करो आज अगर रास्ता सुनसान है 🌑 तो भी चलते रहो। क्योंकि समर्पण भीड़ के लिए नहीं होता समर्पण उस दिन के लिए होता है जब तुम्हारा वक्त बोलेगा 🕰️✨ याद रख दोस्त 💪 जो खुद को अपने लक्ष्य के हवाले कर देता है उसे कोई हरा नहीं सकता। समर्पण करो — डर से नहीं, अपने सपने से। 🚀🔥
Happy Republic Day...🙏💐💐🌺🌺💐
पति: आज खाने में क्या है? पत्नी: जो कल था, वही गरम कर दिया है। पति: पर कल तो कुछ भी नहीं था? पत्नी: हाँ, तो आज भी वही है!😂😂😂
प्यार की तड़प शहर की भीड़भाड़ वाली उस शाम में, 'द ओल्ड कैफ़े' की खिड़की वाली मेज पर कबीर बैठा था। सामने वाली कुर्सी खाली थी, लेकिन वहां रखी ठंडी हो चुकी कॉफी बता रही थी कि कोई उम्मीद अभी बाकी है। तभी दरवाज़े की घंटी बजी और मीरा अंदर आई। उसके चेहरे पर एक अजीब सा ठहराव था, जैसे तूफ़ान के थमने के बाद की शांति। "देर हो गई," मीरा ने बैठते हुए कहा। उसकी आवाज़ में कोई माफ़ी नहीं थी, बस एक तथ्य था। कबीर ने उसे गौर से देखा। "देर अक्सर रास्तों की वजह से नहीं, इरादों की वजह से होती है, मीरा।" मीरा ने मुस्कुराने की कोशिश की, पर उसकी आँखें कहीं और थीं। "इरादे तो मौसम की तरह होते हैं, कबीर। बदलते रहते हैं। तुम यहाँ कब से हो?" "शायद पिछले तीन सालों से। बस आज कुर्सी पर बैठकर इंतज़ार कर रहा हूँ।" "इतनी लंबी तड़प सेहत के लिए अच्छी नहीं होती," मीरा ने वेटर को इशारा करते हुए कहा। "तड़प सेहत के लिए नहीं, रूह के लिए होती है। जो सुकून में है, वह ज़िंदा तो है, पर शायद जागृत नहीं।" कबीर के शब्दों में एक धार थी। "तो तुम जाग रहे हो?" "मैं उस आग को महसूस कर रहा हूँ जो बुझने से इनकार कर रही है। तुम्हें क्या लगा? तुम शहर छोड़ दोगी, खत लिखना बंद कर दोगी, और सब खत्म हो जाएगा?" मीरा ने अपनी उंगलियों से मेज पर एक काल्पनिक लकीर खींची। "खत्म तो कुछ भी नहीं होता। बस प्राथमिकताएं बदल जाती हैं। मेरी ज़िम्मेदारी अब किसी और के प्रति है।" "ज़िम्मेदारी या समझौता?" मीरा की आँखों में चमक आई। "क्या दोनों में कोई फर्क है? समाज जिसे समझौता कहता है, उसे निभाने वाला इंसान उसे अपनी जीत समझता है।" "यह तुम्हारी दार्शनिक बातें मुझे बहला नहीं पाएंगी। तुम्हारी आँखों के नीचे जो काले घेरे हैं, वे रातों की नींद की नहीं, उस तड़प की गवाही दे रहे हैं जिसे तुम दबाने की कोशिश कर रही हो।" "तुम बहुत ज़्यादा पढ़ लेते हो, कबीर। कभी-कभी पन्ने सादे रहने देने चाहिए।" "सादे पन्ने ही सबसे ज्यादा शोर करते हैं, मीरा। बताओ, क्या वह तुम्हें वैसे देखता है जैसे मैं देखता था?" मीरा चुप रही। कैफ़े में बज रहा हल्का संगीत अचानक भारी लगने लगा। "वह मुझे 'देखता' है, कबीर। उसे मेरी रूह की परवाह नहीं, उसे बस मेरे साथ की ज़रूरत है। और दुनिया में 'साथ' होना ही काफी माना जाता है।" "तुम्हारे लिए काफी है?" "मेरे पास विकल्प क्या है?" मीरा की आवाज़ थोड़ी लड़खड़ाई। कबीर अपनी जगह से थोड़ा आगे झुका। "विकल्प हमेशा होता है। बस हिम्मत की कमी होती है। तड़प का मतलब यह नहीं कि हम दूर हैं, तड़प का मतलब यह है कि हम पास होकर भी वो नहीं कह पा रहे जो दिल में है।" "कहने से क्या बदल जाएगा? दीवारें नहीं गिरेंगी।" "कम से कम हवा तो अंदर आएगी।" तभी मीरा के फोन की घंटी बजी। उसने स्क्रीन देखी—'घर'। उसने फोन काट दिया। "तुम्हारी चुप्पी का अर्थ गहरा है," कबीर ने तंज किया। "तुम भाग रही हो, लेकिन पैर वहीं जमे हुए हैं।" "कबीर, प्रेम कोई कविता नहीं है जिसे जब चाहे सुधार लिया जाए। यह एक कड़वा सच है जिसे निगलना पड़ता है।" "मैंने तो इसे अमृत समझा था।" "तभी तो आज तुम्हारी प्यास इतनी गहरी है," मीरा ने खड़े होते हुए कहा। "तुम्हें प्यास से प्यार हो गया है, मुझसे नहीं।" कबीर भी खड़ा हो गया। "प्यास ही तो अस्तित्व का प्रमाण है। जिस दिन तड़प खत्म हो जाएगी, उस दिन कबीर भी मर जाएगा।" "तो फिर जलते रहो। शायद इसी में तुम्हारी मुक्ति है।" मीरा मुड़ी और दरवाज़े की तरफ बढ़ गई। कबीर वहीं खड़ा रहा। उसने मीरा को हाथ पकड़कर रोकने की कोशिश नहीं की, क्योंकि उसे पता था कि शरीर को रोकने से रूह की तड़प और बढ़ जाती है। दरवाज़ा बंद हुआ। बाहर बारिश शुरू हो गई थी। कबीर ने खिड़की के बाहर देखा। मीरा छाता खोल चुकी थी, लेकिन उसका एक कंधा बारिश में भीग रहा था—बिल्कुल वैसे ही जैसे उसकी ज़िंदगी का एक हिस्सा हमेशा अधूरा रहने वाला था। कबीर ने वेटर को बुलाया। "एक और कॉफी। इस बार थोड़ी और कड़वी।" वेटर ने हैरान होकर पूछा, "अकेले के लिए सर?" कबीर मुस्कुराया, "नहीं, इस तड़प के साथ पीने के लिए। यह आज रात मेरे साथ ही ठहरेगी।" बाहर की सड़कें अब पानी से लबालब थीं, लेकिन कबीर के अंदर की आग ठंडी होने का नाम नहीं ले रही थी। तड़प का अंत मिलन नहीं, बल्कि उस दर्द को गले लगा लेना था जो अब उसकी पहचान बन चुका था।
साहूकार का कर्ज धूल और धूप से सनी दोपहर में विमल का कच्चा आंगन किसी पुरानी अदालत जैसा लग रहा था। लाला जगत नारायण, जिनके कुर्ते की सफेदी उनकी नीयत के बिल्कुल उलट थी, नीम की छांव में बिछी चारपाई पर ऐसे बैठे थे जैसे पूरा गांव उनकी जागीर हो। "विमल, समय रेत की तरह हाथ से फिसलता है। और ब्याज? वह तो हवा की तरह है, जो दिखती नहीं पर दम घोंट देती है," लाला ने अपनी उंगलियों में फंसी सोने की अंगूठी घुमाते हुए कहा। विमल ने अपनी फटी हुई कमीज का कोना मरोड़ा। "लाला, फसल इस बार सिर्फ मिट्टी बनकर रह गई। उम्मीद थी कि..." "उम्मीदें पेट नहीं भरतीं, जवान," लाला ने बीच में ही टोक दिया। "बैंक कागज मांगता है, और मैं? मैं बस भरोसा मांगता हूं। लेकिन भरोसा भी अब कर्ज के नीचे दब गया है।" विमल की पत्नी, सुजाता, दरवाजे की ओट से सुन रही थी। वह बाहर आई, आँखों में डर नहीं, बल्कि एक अजीब सी चमक थी। "लाला जी, भरोसा तो हमने किया था। उस दिन जब आपने कहा था कि ये पैसे हमारी बेटी की शादी के लिए नहीं, हमारे भविष्य के लिए हैं। क्या कर्ज सिर्फ पैसों का होता है?" लाला ने एक ठंडी मुस्कान बिखेरी। "बेटी, दुनिया गणित पर चलती है, जज्बात पर नहीं। हिसाब बराबर करना ही धर्म है।" तभी विमल का छोटा भाई, आर्यन, जो शहर से लौटा था, आंगन में दाखिल हुआ। उसने अपनी जेब से एक मुड़ा हुआ लिफाफा निकाला। "हिसाब ही करना है न लाला? लीजिए, ये आपके मूल और ब्याज की पहली किस्त।" लाला की भौहें तन गईं। "शहर ने तुम्हें चालाकी सिखा दी है, आर्यन। पर याद रखना, कागजों पर स्याही मेरी है।" "स्याही आपकी हो सकती है, पर पसीना हमारा है," आर्यन ने तीखे स्वर में कहा। "आप कर्ज देते हैं ताकि इंसान कभी खड़ा न हो सके। आप चाहते हैं कि हम आपकी परछाईं में जिएं।" विमल घबरा गया। "आर्यन, तमीज से बात कर। लाला ने हमारी मदद की थी।" "मदद?" आर्यन हंसा, पर उस हंसी में कड़वाहट थी। "भाई, यह मदद नहीं, निवेश था। लाला जानते थे कि बारिश नहीं होगी। वे जानते थे कि आप चुका नहीं पाएंगे, और फिर वे इस जमीन को अपनी हवेली का हिस्सा बना लेंगे। क्या मैं गलत कह रहा हूं, लाला जी?" आंगन में सन्नाटा पसर गया। लाला जगत नारायण ने अपना चश्मा साफ किया और विमल की ओर देखा। "तुम्हारा भाई बहुत बोलता है, विमल। पर क्या यह जानता है कि जिस लिफाफे को यह 'आजादी' समझ रहा है, वह सिर्फ एक नई जंजीर की शुरुआत है?" सुजाता ने हस्तक्षेप किया, "कैसे?" "क्योंकि," लाला उठे और विमल के कंधे पर हाथ रखा, "कर्ज सिर्फ रुपयों का नहीं होता। जो इज्जत मैंने इस गांव में तुम्हें बख्शी, उसका ब्याज कैसे चुकाओगे? लोग कहेंगे कि विमल का भाई चोरी करके लाया या भीख मांगकर। तुम्हारी रीढ़ की हड्डी तो मैंने उसी दिन तोड़ दी थी जब तुमने पहली बार मेरे सामने हाथ फैलाए थे।" विमल का सिर झुक गया। उसे अहसास हुआ कि लाला सही थे। पैसे चुकाए जा सकते थे, पर वह अहसान? वह नजरें जो अब कभी लाला से नहीं मिल पाएंगी? "मैं पैसे वापस ले जाऊंगा," लाला ने लिफाफे को छुए बिना कहा। "कल आना। कागजात तैयार मिलेंगे। लेकिन विमल, याद रखना, जब तुम आजाद हो जाओगे, तो तुम सबसे ज्यादा अकेले होगे। क्योंकि गुलाम को कम से कम मालिक का साथ तो मिलता है, आजाद आदमी को खुद का बोझ खुद उठाना पड़ता है।" लाला अपनी लाठी टेकते हुए बाहर निकल गए। पीछे छोड़ गए एक ऐसा आंगन जहां कर्ज खत्म हो चुका था, पर बोझ पहले से ज्यादा महसूस हो रहा था। आर्यन ने लिफाफा मेज पर पटक दिया। "भाई, हम अब किसी के कर्जदार नहीं हैं।" विमल ने अपनी खाली हथेलियों को देखा और धीमी आवाज में बोला, "पैसे दे दिए आर्यन, पर क्या हम वाकई आजाद हुए? या अब हम उस खालीपन के कर्जदार हो गए जो लाला ने हमारे अंदर छोड़ दिया है?" धूप ढल रही थी, और उस घर की दीवारों पर परछाइयां लंबी होती जा रही थीं—बिल्कुल उस कर्ज की तरह, जो कागज पर तो मिट गया था, पर रूह पर अपनी लिखावट छोड़ गया
थॉमस एडिसन का अंधेरा: हजार असफलताओं की रौशनी यह 1870 के दशक की बात है, जब न्यूयॉर्क की सड़कों पर गैस लैंपों की मद्धिम रौशनी ही रात का सहारा थी। इसी शहर की एक छोटी-सी प्रयोगशाला में थॉमस एडिसन नाम का एक व्यक्ति दिन-रात एक धुन में लगा रहता था। उसका सपना था, बिजली से जलने वाला ऐसा बल्ब बनाना जो हर घर को रोशन कर दे। एक दिन शाम को, एडिसन अपनी प्रयोगशाला में तार और कांच के बल्बों के ढेर के बीच बैठा था। उसके सहायक, जेम्स, ने झुँझलाहट भरे स्वर में कहा, "थॉमस, हमने फिर कोशिश की, यह फिलामेंट भी टूट गया! यह हजारवीं बार है जब हम फेल हुए हैं।" एडिसन ने मुस्कुराते हुए जेम्स की तरफ देखा। उसकी दाढ़ी पर कार्बन के निशान थे और आँखें नींद से लाल थीं, लेकिन चेहरे पर हार का कोई भाव नहीं था। "जेम्स," एडिसन ने कहा, "हम फेल नहीं हुए हैं। हमें बस यह पता चला है कि 999 ऐसे तरीके हैं जिनसे बल्ब नहीं जलता।" जेम्स ने गहरी सांस ली, "लेकिन हम कब तक ऐसे ही प्रयोग करते रहेंगे? बाजार में लोग हमारा मजाक उड़ा रहे हैं। वे कहते हैं, 'यह सनकी आदमी अंधेरे में रौशनी ढूंढ रहा है!'" एडिसन उठ खड़ा हुआ। उसने एक पुराना टूटा हुआ फिलामेंट उठाया और उसे अपनी उंगलियों के बीच घुमाया। "जेम्स, इतिहास में कोई भी महान आविष्कार आसानी से नहीं हुआ है। क्या तुम्हें लगता है ग्राहम बेल ने एक बार में टेलीफोन बना दिया होगा? या राइट बंधुओं ने पहली उड़ान में ही सफलता पा ली होगी?" "पर हमें आगे क्या करना चाहिए?" जेम्स ने पूछा। "हमें सिर्फ एक बार सही तरीका खोजना है," एडिसन ने दृढ़ता से कहा, "एक बार। और जब हम उसे ढूंढ लेंगे, तो पूरी दुनिया रोशनी से जगमगा उठेगी।" अगले कुछ हफ्तों तक, एडिसन ने हर संभव सामग्री पर प्रयोग किया। प्लैटिनम, लकड़ी के रेशे, धातु के तार—वह कुछ भी छोड़ने को तैयार नहीं था। उसकी टीम थक चुकी थी, लेकिन एडिसन का जुनून कम नहीं हुआ था। एक रात, जब सब सो रहे थे, एडिसन को एक विचार आया। उसने बांस के बारीक रेशों को कार्बन से उपचारित किया। उसने अपनी धड़कनें रोके हुए उस फिलामेंट को बल्ब में लगाया और स्विच ऑन किया। एक पल के लिए सन्नाटा छा गया। फिर, एक हल्की पीली रौशनी पूरे कमरे में फैल गई। वह रौशनी लगातार जलती रही—एक घंटे, दो घंटे, चार घंटे... चालीस घंटे तक! जेम्स और बाकी सहायक दौड़ते हुए आए। उनकी आँखों में अविश्वास और खुशी के आँसू थे। "हमने कर दिखाया!" जेम्स चिल्लाया। एडिसन ने उस जलते हुए बल्ब को देखा, उसकी आँखों में गहरी संतुष्टि थी। "हाँ, जेम्स। हमने कर दिखाया। और इस बार हमें यह भी नहीं पता चला कि कितने और तरीके थे जिनसे यह काम नहीं करता।" थॉमस एडिसन की इस जीत ने दुनिया को हमेशा के लिए बदल दिया। यह सिर्फ एक बल्ब का आविष्कार नहीं था, यह इस बात का प्रमाण था कि 'असफलता' सिर्फ एक कदम है सफलता की सीढ़ी पर, बशर्ते आप हार न मानें। उसका अंधेरा अब दुनिया की रौशनी बन चुका था
स्वामी विवेकानंद : शिकागो की गर्जना सन् 1893, शिकागो का विशाल कोलंबस हॉल। चारों तरफ विद्वानों, पादरियों और दार्शनिकों की भीड़ थी। गेरुए वस्त्र पहने एक भारतीय युवक कोने में शांत बैठा था। उसके मन में उथल-पुथल थी, पर चेहरा स्थिर। आयोजक ने आवाज दी, "अब भारत से स्वामी विवेकानंद अपना वक्तव्य रखेंगे।" विवेकानंद मंच पर आए। हजारों आँखें उन्हें संदेह और कौतूहल से देख रही थीं। उन्होंने गहरी सांस ली और कहा, "मेरे अमेरिकी भाइयों और बहनों!" इतना सुनते ही पूरा हॉल तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा। दो मिनट तक तालियां रुकने का नाम नहीं ले रही थीं। भाषण के बाद, जब विवेकानंद बाहर निकले, तो प्रोफेसर राइट ने उनसे पूछा, "स्वामी जी, आपने संबोधन में 'भाइयों और बहनों' ही क्यों चुना? यहाँ तो सब लेडीज एंड जेंटलमैन कह रहे थे।" विवेकानंद मुस्कुराए, "प्रोफेसर, बाकी दुनिया के लिए संबंध औपचारिक हो सकते हैं, लेकिन मेरे भारत के लिए पूरा विश्व एक परिवार है। मैंने सिर्फ सत्य को पुकारा था।" तभी एक अहंकारी विदेशी विद्वान पास आया और व्यंग्य से बोला, "साधु जी, आपके देश में तो इतनी गरीबी है, आप यहाँ धर्म की बात करने आए हैं? क्या धर्म पेट भर सकता है?" विवेकानंद की आँखों में एक चमक उभरी, "महोदय, भूखे पेट धर्म नहीं किया जाता, यह सच है। लेकिन जिस संस्कृति के पास हजारों वर्षों का आध्यात्मिक धन हो, वह दरिद्र कैसे हो सकती है? हम रोटी मांगने नहीं, दुनिया को सहिष्णुता और सार्वभौमिक स्वीकृति का पाठ पढ़ाने आए हैं।" उस रात विवेकानंद को एक अमीर परिवार में ठहराया गया। मखमली बिस्तर और ऐशो-आराम देखकर उनकी आँखों में आंसू आ गए। उन्होंने खुद से कहा, "मेरे देश के लोग घास फूस की झोपड़ियों में सो रहे हैं और मैं यहाँ इस विलासिता में? हे माँ, क्या इसीलिए मैं यहाँ आया हूँ?" अगले दिन, एक पत्रकार ने उनसे पूछा, "स्वामी जी, भारत को बदलने के लिए सबसे जरूरी क्या है?" विवेकानंद ने दृढ़ता से जवाब दिया, "आत्मविश्वास। भारत को अपनी शक्ति पहचाननी होगी। उठो, जागो और तब तक मत रुको जब तक लक्ष्य प्राप्त न हो जाए।" शिकागो की उस सभा ने दुनिया को बता दिया कि भारत का गौरव उसकी मिट्टी में नहीं, उसके विचारों में है। स्वामी जी ने न केवल हिंदुत्व का मान बढ़ाया, बल्कि मानवता को एक सूत्र में पिरोने का मंत्र दिया। उनके उस भाषण ने गुलाम भारत के सोए हुए स्वाभिमान को जगा दिया, जिसकी गूँज आज भी इतिहास के पन्नों में जीवंत है।
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