तुम्हारे ख़ामोश रहने में भी
कुछ कहा हुआ-सा लगता है,
जैसे पत्थर की छाती में
कोई धड़कन
आज भी ज़िंदा हो।
तुम कहते हो
दिल सख़्त हो गया है,
पर मैंने देखा है—
बरसात के बाद
चट्टानों पर भी
हरी ज़िद उग आती है।
वक़्त जब
तुम पर ठहरकर बरसा होगा,
तो कहीं न कहीं
मेरे नाम की नमी
दिल तक पहुँची होगी।
मैं दावा नहीं करती
कि तुम्हें बदल दूँगी,
बस इतना चाहती हूँ—
जहाँ ज़रा-सी भी
संवेदना बची हो,
वहीं
मेरा इंतज़ार रख देना।
अगर इजाज़त हो,
तो मैं
तुम्हारे दिल में
पूरी नहीं,
बस अधूरी-सी
मोहब्बत बनकर
ठहर जाऊँ।
— तुम्हारी
जो अब भी
तुम्हारे पत्थर होने पर
यक़ीन नहीं करती