शीर्षक: प्रेम एक विवाद
प्रेम क्या है
इक कौतूहल ही तो,
जो क्षण भर न दिखे
तो हृदय शोर से भर उठता है।
प्रेम वह आंतरिक द्वंद्व है
जिसमें न हार होती है, न जीत
हम जीतकर भी प्रेमी के आगे
नतमस्तक हो जाते हैं,
और हार का दोष
हाथों में न उकरे भाग्य-रेखाओं को दे आते हैं।
प्रेम वह समर्पण है
जिसमें ईश्वर की भक्ति बाद में आती है
पहले प्रेमी में ही
ईश्वर के दर्शन हो जाते हैं।
प्रेम वह संवाद है
जो कोसों की दूरियों,
टूटे हुए संपर्कों के बाद भी
एक-दूजे के हृदय में
संवेदनाओं को जन्म देता है।
प्रेम, प्रेम है
जिसे न बखानना संभव है,
न व्याख्या में बाँधा जा सकता है।
इसे तो केवल महसूस किया जा सकता है
और शायद
इसे लिखने या पढ़ने से पहले
महसूस किया जाना आवश्यक है,
जैसे तुम महसूस कर पा रहे होगे मुझे।
इसलिए तुम्हें अब तक लौट आना चाहिए,
क्योंकि तुम्हें स्मृतियों में संजोने की
कोई लालसा नहीं है मुझमें।
यदि कुछ है,
तो बस
तुम्हारी मौजूदगी को महसूस करने की
अनेक हसरतें
जो चुपचाप बसी हैं इस दिल में।
इसीलिए मुझे लगता है
प्रेम अधिकार नहीं, उपस्थिति है।
याद नहीं, अनुभूति है।
यह शब्द नहीं, मौन संवाद है।
मेरा तुमसे हो चुका,
दिल का दिल से एक विवाद है।
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