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एक गुल्लक है मेरे पास। अकेले में जो बातें तुमसे करता हूँ, उनमें से कुछ शब्द बचाकर उस गुल्लक में जमा कर लेता हूँ। जब यह गुल्लक शब्दों से भर जाएगा और तुम अनायास कहीं मिल जाओगी— तब मेरे पास कहने को बहुत कुछ होगा। मैं निडर होकर सब कुछ कह दूँगा तुमसे।
अचानक राह चलते उसे देख लिया मैंने। वह पल अब, समेट रहा है, कुछ बीते पलों को, और मैं — सिमट चुका हूँ, उस पल में।
शहर में रात नहीं होती बिजली के गोले, समूह में इकट्ठा होकर सूरज बन जाते हैं और रात को छिपा लेते हैं। गाँव में रात और दिन दोनों होते है समय पर, वहाँ तारे सूरज का विकल्प बन जाते हैं। अब धरती भी बट गई है दो-दो हिस्सों में, एक धरती प्रकृति के साथ और एक प्रकृति के विरुद्ध।
पत्थर के शहर से, भीड़ के शोर से, मैं दूर जाना चाहता हूँ। यहां रोक लेते है, बीच चौराहे पर, एक भीड़ को, दूसरी भीड़ के लिए। अनजानी भीड़ का, मैं भी हिस्सा होता हूँ, कभी इस ओर, कभी उस ओर। मैं ऊब चुका हूँ, शहर के नियमों से, थक सा गया हूँ, भीड़ की नितियों से। मैं जीना चाहता हूँ, शहर से दूर, भीड़ से अलग, मन की दिशा में, और एकांत में।
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