छूट रहे हाथ सदा दे जाते हैं लौट आने की कई उम्मीदें
जिनसे चमक उठता है सारा बदन
और आंखों से बह कर ढह जाती हैं सारी वेदनाएं,
जिसमें छिपी होती हैं विरह में बिताई गई वो सारी रातें
केशों की तरह समेट ली जाती हैं
वे चंद घड़ियाँ जिसमें की गई हो प्रेम भरी वो असंख्य बातें।
और अंततः दे दी जाती है
विदाई हर परदेसी को प्रिय की सौगंध देकर
तुम लौटना मेरे फ़ौजी फहरता हुआ तिरंगा लेकर..।
- softrebel