अपनों से कुछ रिश्ते ऐसे बनाये रखे हैं।
जैसे कुछ परायो को गले लगाये रखे हैं।

मुख़्तसर होते हुवे भी बहोत लगा मुझे,
माँ की गोदी में सर जो छिपाये रखे हैं।

मर्ज़ कोई भी हमें अच्छा नहीं लगता,
हमने दर्द भी चुन चुन के बसाई रखे हैं।

सख्शियत मेरी आज भी जिंदा हैं वहां
जिस जिस चोखट पे हम सर जुकाई रखे हैं।

और महोब्बत का दूजा नाम हैं इबादत।
तुजे आयत की तरह जुबान पे सजाई जो रखे हैं।

एकंक

Hindi Shayri by mayank makasana : 408
New bites

The best sellers write on Matrubharti, do you?

Start Writing Now