घर जाता हूँ तो मेरा ही बैग मुझे चिढ़ाता है,

मेहमान हूँ अब ,ये पल पल मुझे बताता है ..
.
माँ कहती है, सामान बैग में फ़ौरन डालो,
हर बार तुम्हारा कुछ ना कुछ छुट जाता है...

घर पंहुचने से पहले ही लौटने की टिकट, वक़्त परिंदे सा उड़ता जाता है,

उंगलियों पे लेकर जाता हूं गिनती के दिन,
फिसलते हुए जाने का दिन पास आता है.....

अब कब होगा आना सबका पूछना ,
ये उदास सवाल भीतर तक बिखराता है,

घर से दरवाजे से निकलने तक ,
बैग में कुछ न कुछ भरते जाता हूँ ..


तू एक मेहमान है अब ये पल पल मुझे बताता है..

Hindi Shayri by Smit : 296
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